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नरभक्षी जानवर से बचना है तो इस ट्रिक को जरूर आजमाएं, नहीं खाएंगे धोखा

Sat, 29 Jul 2017 09:20 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : indian photo agency
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अगर आपको नरभक्षी जानवर से बचना है तो इस ट्रिक को जरूर आजमाएं। यकीन मानिए आप बच सकते हैं। यह बात हम नहीं बल्कि  47 नरभक्षी तेंदुए और दो आदमखोर बाघों के शिकारी ने खुद कबूला है। जानिए...
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प्रख्यात शिकारी और शिक्षक लखपत सिंह का कहना है कि उत्तराखंड में नरभक्षी के हमलों से बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हमें जंगलों को बचाना होगा। तभी मानव व वन्य जीव दोनों सुरक्षित रह सकेंगे। उन्होंने कहा कि नरभक्षी पीछे से हमला करता है। ऐसे में नरभक्षी प्रभावित क्षेत्र के लोग सिर के पीछे मुखौटा लगाकर उसे भ्रमित कर सकते हैं। 

अजीम प्रेमजी फाउंडेशन और स्वैच्छिक शिक्षक मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि बाघ और गुलदार को आदमखोर बनने से रोकने के लिए जंगलों को संरक्षित और उन्हें पोषित करना जरूरी है। इससे वन्य जीवों के लिए भोजन श्रृंखला जंगल में ही बनी रहेगी। तेंदुआ और बाघ रहे और हम भी रहें। इसी सिद्धांत पर चलना होगा। 
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leopard attack
अब तक 47 नरभक्षी तेंदुए और दो आदमखोर बाघों को मौत के घाट उतारने वाले शिकारी रावत ने कहा कि तेंदुए का हमला अमूमन शाम छह बजे से रात्रि आठ बजे के बीच होता है। इस दौरान बच्चों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। 

उन्होंने बताया कि तेंदुआ आगे से हमला नहीं करता है। इसलिए प्रभावित क्षेत्र में पीछे से विभिन्न मुखौटों का इस्तेमाल कर तेंदुए को भ्रमित किया जा सकता है। लैंटाना वाले क्षेत्र में तेंदुए का हमला ज्यादा होता है।  क्योंकि उस क्षेत्र में उसके छिपने के लिए काफी स्थान होता है।

उन्होंने कहा कि बाघ अथवा तेंदुए का बूढ़ा हो जाना, उसके दांतों का टूटना और घिसना, शारीरिक अक्षमता, मादा तेंदुए का अपने बच्चों के लिए दूध और भोजन की तलाश और सिमटते जंगल इनके नरभक्षी बनने के मुख्य कारण हैं। 
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