सीमा विस्तार के बाद कई नगर निकायों के प्रमुखों की कुर्सी खिसक सकती है। अगले साल चुनाव में जाने से पहले सरकार ऐसे निकायों में बोर्ड भंग करने की संभावना तलाशने में जुट गई है, जहां पर सीमा विस्तार हो रहा है।
सरकार ने इस संबंध में विधिक परीक्षण कराने के निर्देश जारी किए हैं। इसके बाद, विभागीय अफसर नगर निगम और नगर पालिका के एक्ट टटोलने में जुट गए हैं। नगर निगम घोषित होने के बाद कोटद्वार और ऋषिकेश में बोर्ड भंग होना तय माना जा रहा है।
अन्य 38 नगर निकायों के प्रमुखों की कुर्सी पर भी संकट के बादल मंडराते दिख रहे हैं, हालांकि इस संबंध में कोई भी निर्णय लेने से पहले सरकार सब कुछ ठोक-बजाकर देख लेना चाहती है। सरकार की मंशा साफ है। निकाय चुनाव का सामना करने से पहले वह सीमा विस्तार की जद में आए निकायों में ठोस काम करना चाहती है।
वह ग्रामीण से शहरी बनी आबादी के बीच अच्छा संदेश देना चाहती है, ताकि उसे चुनाव में सियासी लाभ मिले। इनमें से कई निकाय ऐसे हैं, जहां पर भाजपा का बोर्ड नहीं है। बोर्ड भंग कराए बगैर सरकार इनमें कोई भी निर्णय आसानी से लागू करने की स्थिति में नहीं है।
इन निकायों में हुआ है सीमा विस्तार
उत्तराखंड में 92 नगर निकाय हैं। इनमें से 40 निकायों में सीमा विस्तार के प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है। देहरादून समेत 14 नगर निकायों में सीमा विस्तार की अंतिम अधिसूचना भी जारी हो चुकी है। बाकियों के संबंध में आपत्तियों की सुनवाई का काम चल रहा है।
इन निकायों में हुआ है सीमा विस्तार
नगर निगम देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी-काठगोदाम, रुद्रपुर, काशीपुर, रुड़की।
नगर पालिका/नगर पंचायत
विकासनगर, लंढौरा, झबरेड़ा, कर्णप्रयाग, कीर्तिनगर, देवप्रयाग, नरेंद्रनगर, कोटद्वार, बागेश्वर, लालकुंआ, पोखरी, पिथौरागढ़, गदरपुर, किच्छा, सितारगंज, दिनेशपुर, शक्तिगढ़, सुल्तानपुर पट्टी, बड़कोट, जोशीमठ, डोईवाला, अल्मोड़ा, बाजपुर, भवाली, खटीमा, भीमताल, हरर्बटपुर, ऋषिकेश, रुद्रप्रयाग, ऊखीमठ, अगस्त्यमुनि, उत्तरकाशी, टनकपुर, गूलरभोज।
क्या कहते हैं नगर निगम और पालिका के एक्ट
क्या कहते हैं नगर निगम और पालिका के एक्ट
नगर निकायों की व्यवस्था में दो एक्ट का प्राविधान है। नगर निगम के लिए अलग एक्ट है और नगर पालिका व पंचायतें अलग एक्ट से संचालित होते हैं। उत्तराखंड बनने के बाद भी राज्य अपना एक्ट नहीं बना पाया है और उसने यूपी के एक्ट को ही स्वीकार किया है। दोनों ही एक्ट की जो प्रतिध्वनि उभरती है, उसमें निकाय के उच्चीकृत होने पर बोर्ड भंग होने की बात को सामने रखा गया है। हालांकि सीमा विस्तार होने पर निकाय के बोर्ड की स्थिति पर कोई फर्क न पड़ने की बात कही गई है। इन स्थितियों के बीच, ये भी स्थिति है कि राज्य सरकार को विशेष परिस्थितियों में बोर्डों को लेकर असीमित अधिकार प्रदान किए गए हैं।
सीमा विस्तार होने के बाद की स्थिति में सरकार यह परीक्षण करा रही है कि बोर्ड की स्थिति क्या होनी चाहिए। इस संबंध में न्याय सचिव से भी वार्ता हुई है। उनसे विधिक राय मांगी गई है। सारी स्थितियों का परीक्षण करने के बाद सरकार उचित निर्णय लेगी।
-मदन कौशिक, शहरी विकास मंत्री, उत्तराखंड