एसआईटी ने फर्जी प्रमाण-पत्रों के आधार पर शिक्षकों की नियुक्तियों की जांच में जुटाए गए तथ्यों से बेसिक शिक्षा विभाग को चारों खाने चित कर दिया है।
अब तक तो सिर्फ शिकायतें थीं, मगर एसआईटी ने साक्ष्य जुटाने के बाद इन शिकायतों पर मुहर लगाकर शिक्षा विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अभी तो यह सिर्फ बानगी है, आगे चलकर प्रमाण-पत्रों की जांच का परिणाम कितने शिक्षकों और अधिकारियों के मुंह पर कालिख पोतने का कारण बनेगा, यह देखने लायक होगा।
शासन के आदेश पर 13 जुलाई 2017 को सीबीसीआईडी की अपर पुलिस अधीक्षक श्वेता चौबे की अगुवाई में गठित एसआईटी के पास बेसिक शिक्षा विभाग के करीब 144 शिक्षकों के खिलाफ अमान्य प्रमाण-पत्र होने की शिकायत आई थी। इन प्रमाण-पत्रों के सत्यापन की जांच के लिए पत्रावली देश के कई राज्यों में भेजी गई है। अब तक दो शिक्षा मित्रों समेत 15 शिक्षकों की डिग्री की पोल पट्टी सामने आ चुकी है।
कई शिक्षा मित्र ऐसे हैं, जिन्हें दसवीं के बाद बारहवीं करने में 15 से 20 साल का वक्त लगा है। वह अमान्य डिग्री के आधार पर नौकरी पा गए। एक शिक्षक तो एक साल हाईस्कूल में फेल होने के बाद उसी साल पास होने का प्रमाण-पत्र लाकर ‘गुरुजी’ का तमगा पा गए।
अब तक सामने आए एसआईटी जांच के नतीजे
1. एसआईटी की संस्तुति पर ही सावित्री शिक्षा सदन जूनियर हाईस्कूल हर्रावाला के चार शिक्षकों अजय कुमार सिंह, नीलम पांडेय, सुनीता सिंह और कौशलेंद्र के अलावा प्रबंध समिति के खिलाफ अमान्य डिग्री से नियुक्ति देने पर जालसाजी का मुकदमा दर्ज हुआ।
2. एसआईटी जांच में मंगलौर के शिक्षक नरेश चोपड़ा की हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद से ली गई विशारद की डिग्री अमान्य पाई गई है। 2010 में विभाग ने उन्हें हटाने के आदेश दिए थे। वह इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट चले गए। यह मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
3. कालसी स्कूल में तैनात शिक्षा मित्र गुलाब सिंह ने 1986 में हाईस्कूल किया था। इसके बाद उन्हें इंटर पास करने में 20 साल का समय लग गया। 2006 में गुलाब सिंह ने हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद से बारहवीं की। 2004 में शिक्षा आचार्य बनने के बाद 2011 में गुलाब सिंह ने गढ़वाल विवि से बीए किया। इस डिग्री से उन्हें शिक्षा मित्र के रूप में तैनाती मिल गई। फि र उन्होंने 2014 में सिंह नेशनल ओपन विवि से बारहवीं पास की।
4. भगवानपुर के शिक्षक जहेंद्र ने नियुक्ति के समय 1993 में बीएमएस इंटर कॉलेज मऊखास, मेरठ से उत्तीर्ण होने की अंक तालिका प्रस्तुत की थी। एसआईटी जांच में पता चला कि जहेंद्र ने सहारनपुर के एक कॉलेज से 1993 में संस्थागत छात्र के रूप में हाईस्कूल की परीक्षा दी थी, जिसमें फेल हो गए थे। ऐसे में इसी साल पास होने की उनकी अंक तालिका फर्जी पाई गई।
5. कालसी के शिक्षा मित्र मोहन सिंह की डिग्री भी अमान्य पाई गई है। उन्होंने हाईस्कूल करने के 16 साल बाद हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद से मध्यमा की डिग्री प्राप्त की। इसी आधार पर गढ़वाल यूनिवर्सिटी से बीए कर शिक्षा मित्र बन गए।
एसआईटी अब तक की सबसे बड़ी जांच कर रही है, क्योंकि कई वर्षों में हुई शिक्षकों की नियुक्तियों के प्रमाण-पत्रों की जांच होनी है। यह एक बड़ा काम है, लिहाजा बड़ी सावधानी से किया जा रहा है। लगातार एसआईटी की कार्रवाई की समीक्षा कर रहा हूं, ताकि किसी तरह के शक की गुंजाइश न रहे। शिक्षकों के प्रमाण-पत्रों की जांच में हैरत भरे नतीजे सामने आ रहे हैं। जांच का दायरा बढ़ाने के संबंध में अभी किसी तरह का आदेश नहीं मिला है। आदेश के मुताबिक ही अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।
- राम सिंह मीणा, अपर पुलिस महानिदेशक, प्रशासन
अमर उजाला की खबरों पर एसआईटी की मुहर
अमर उजाला ने 28 मार्च 2017 से शिक्षा विभाग में फर्जी प्रमाण-पत्रों के आधार पर नियुक्तियों को लेकर अपनी मुहिम शुरू की थी। बड़ी बात यह थी कि फर्जी शिक्षकों के खिलाफ लामबंद लोगों ने अमर उजाला की इस मुहिम का न केवल समर्थन किया, बल्कि फर्जी प्रमाण-पत्रों के दस्तावेजी साक्ष्य भी मुहैया कराए। कई माह के संघर्ष के बाद सरकार ने 17 जुलाई को मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित करने के आदेश दिए। एसआईटी ने इस जिम्मेदारी को निभाते हुए पूरे खेल की पर्तें खोलनी शुरू कर दीं। अमर उजाला ने जो कुछ भी लिखा था, वह एसआईटी की जांच में सही पाया गया। हालांकि, अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय अमर उजाला की इस मुहिम का समर्थन करते हुए एसआईटी को भरपूर सहयोग दे रहे हैं।