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अपना फर्ज भूल दूसरों को 'ज्ञान' देते रहे शंकराचार्य

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शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती सोमवार शाम तीन बजे हरिद्वार से दिल्ली चले गए। 10 दिनों तक उन्होंने खूब सनसनी फैला कर रखी।
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अगर देखा जाए तो वह इन दिनों केवल मीडिया में छाए रहे। इस दौरान उन्होंने हिंदू धर्म के गुरु होने का कर्तव्य नहीं निभाया।

रोजाना नए-नए बयानों से वे मीडिया में छाए रहे। जिन धार्मिक विवादों को सुलझाने की अपेक्षा शंकराचार्य से हर वर्ष की जाती है, वे इस बार भी अनसुलझे रहे।

प्रतिवर्ष जून में हरिद्वार आने वाले द्वारिका और ज्योर्तिपीठ के शंकराचार्य पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी बद्री-केदार नहीं गए। जबकि उससे पहले वे प्रत्येक वर्ष जोशीमठ स्थित ज्योर्तिमठ में अवश्य जाते थे।

इस बार तो स्वामी स्वरूपानंद ने द्वारिका और बद्रीनाथ पीठों पर दावा कर रहे कईं शंकराचार्यों की बाबत चर्चा तक नहीं की।

पीठ से जुड़े विवादों पर नहीं की बात

पीठों से जुड़े विवादों पर उन्होंने सहयोगियों अथवा साधु-संतों से एक बार भी बात नहीं की। अपने उत्तराधिकारी के प्रश्न को भी अधर में छोड़ दिया।

हरिद्वार प्रवास के दौरान स्वरूपानंद सरस्वती ने साईं और साईं भक्तों पर कड़े प्रहार किए। साईं ट्रस्टों में शामिल जैन समाज पर भी वे जमकर बरसे।

हरिद्वार आईं उमा भारती पर उन्होंने तंज कसे। वस्तुत: शंकराचार्य का इस बार का प्रवास द्वेष, कलुष और कलह से भरा दिखाई दिया।

जाते-जाते वे अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता के रूप में ऐसे मुद्दे छोड़ गए, जिन्हें हल करना संसद के तीन चौथाई समर्थन से ही संभव है।

शंकराचार्य की इस बार की हरिद्वार यात्रा चर्चा में तो खूब रही लेकिन सनातन धर्मावलंबियों को किसी मंजिल तक नहीं पहुंचा पाई।

संत सम्मेलन तो हुआ पर नहीं पहुंचे दिग्गज

शंकराचार्य स्वरूपानंद पर कांग्रेसी संत होने का लेबल लगा है। उसके बावजूद उनके सम्मेलन में कांग्रेस से नजदीकियां रखने वाला एक भी दिग्गज संत रविवार शाम नहीं पहुंचा।

विहिप से जुड़े संतों ने तो 10 दिन हरिद्वार में ठहरे शंकराचार्य की सुध तक नहीं ली। हरिद्वार में संतों की संख्या बेशुमार है। लेकिन शंकराचार्य द्वारा बुलाए संत सम्मेलन में अखाड़ा परिषद, षड़दर्शन साधु समाज, संत समिति आदि का कोई प्रमुख संत नहीं पहुंचा।

लंबे अरसे से कांग्रेस से जुड़ा रहा भारत साधु समाज सम्मेलन में पहुंचा, लेकिन ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी, सतपाल ब्रह्मचारी, हंसदेवाचार्य जैसे किसी बड़े संत ने सम्मेलन में शिरकत नहीं की।

शंकराचार्य चाहकर भी हरिद्वार में मौजूद बाबा रामदेव को सम्मेलन में नहीं बुला पाए।

कई पीठाधीश्वरों, महामंडलेश्वरों, श्रीमहंतों और गद्दीनशीनों ने शंकराचार्य से दूरी बनाए रखी। एक दिन पहले अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत हरि गिरी ने देर रात शंकराचार्य के पास जाकर हालचाल पूछा था।

जैसे ही उन्हें पता चला कि शंकराचार्य उन्हें संत सम्मेलन में बुलाकर अध्यक्षता करना चाहते हैं वे रातोंरात नासिक चले गए।

उमा के खिलाफ नहीं भारत साधु समाज

भारत साधु समाज के संस्थापक महामंत्री स्वामी हरिनारायणानंद ने कहा कि भारत साधु समाज केंद्रीय मंत्री उमा भारती के खिलाफ नहीं है।

संतों द्वारा व्यक्त की गई प्रतिक्रिया शंकराचार्य के समर्थन में थी। भारत साधु समाज अपने दायित्वों को भलीभांति समझता है। शंकराचार्य के मुद्दों के प्रति साधु समाज समर्पित है।

बयान का समर्थन
जय मां मिशन के आचार्य स्वामी महादेव ने कनखल जाकर स्वरूपानंद सरस्वती से भेंट की। उन्होंने आग्रह किया कि पंजाब एवं जम्मू/कश्मीर प्रांतों में चल रहे धर्म रक्षा अभियान में शंकराचार्य सहयोग दें।

आरोप लगाया कि दोनों प्रांतों में हिंदू धर्मस्थलों पर कब्जे किए जा रहे हैं। उन्होंने साईं पूजा के संबंध में शंकराचार्य द्वारा दिए बयान का समर्थन किया।
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‘सक्षम है प्रधानमंत्री, हटाएं अनुच्छेद 370’

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा लेनी चाहिए।

अपार बहुमत से प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी इस दिशा में अब कदम उठा सकते हैं। कश्मीरी जनता राष्ट्र की मुख्यधारा में आए तो देश का सौभाग्य होगा। एक देश में दो ध्वज और दो संविधान दुर्भाग्यपूर्ण है।

सोमवार को कनखल स्थित शंकराचार्य मठ में पत्रकारों से वार्ता में जगद्गुरु ने कहा कि कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। अनुच्छेद 370 औचित्यहीन और जाति के आधार पर बने कानून गलत हैं।

यह संकट हमेशा के लिए समाप्त हो जाना चाहिए। सभी के लिए समान नागरिक संहिता बनाई जानी चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई की केंद्र सरकार अब एक देश, दो संविधान की व्यवस्था समाप्त करेगी और कश्मीरियों को देश की मुख्यधारा में लाएगी।

शंकराचार्य ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी के प्रचार के लिए अच्छी पहल की है। अंग्रेजी भाषा की गुलामी हीन भावना पैदा कर रही है। शिक्षा माध्यम हिंदी बने तो गरीब का बच्चा भी ऊंचे पद पर पहुंच सकता है।

स्वामी स्वरूपानंद ने कहा कि सरकार में बैठे मंत्री यदि धर्माचार्यों पर टिप्पणी करते हैं तो खेद का विषय है। उमा भारती से उनका कोई द्वेष नहीं हैं।

हमने सदैव देश के कल्याण की बात की है। उन्होंने मीडिया से आग्रह किया कि वह देश में संस्कार रोपित करने का काम करें।
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