आरक्षण की सुविधा अपने पैतृक राज्य में ही मिलेगी
शासन के अधिकारियों के मुताबिक शिक्षा निदेशालय से दिशा-निर्देश मांगे जाने के बाद शासन ने समाज कल्याण, कार्मिक और न्याय विभाग से इस संबंध में सुझाव मांगा था। जिस पर कार्मिक विभाग के 10 अक्तूबर 2002 के शासनादेश का हवाला दिया गया कि उत्तराखंड राज्य के अलावा उत्तर प्रदेश एवं अन्य किसी राज्य का कोई व्यक्ति उत्तराखंड राज्य की राज्याधीन सेवाओं में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लिए अनुमन्य आरक्षण का लाभ नहीं पा सकेगा।
इसके अलावा समाज कल्याण विभाग के 29 दिसंबर 2008 का वह शासनादेश जो डीएम देहरादून को संबोधित है। उसके बिंदु संख्या तीन में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 74 में संरक्षण केवल सेवा शर्तों के लिए है। ऐसे संरक्षण में ऐसे कर्मचारियों की संतान को अपने पैतृक राज्य के अलावा दूसरे राज्य में आरक्षण की कोई सुविधा नहीं मिलेगी न ही उन्हें दूसरे राज्य के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग का समझा जाएगा। उन्हें आरक्षण की सुविधा अपने पैतृक राज्य में ही मिलेगी।
नियुक्ति के लिए उत्तराखंड की बहुओं ने किया था आंदोलन
नियुक्ति की मांग को लेकर उत्तराखंड की बहुओं ने पिछले दिनों शिक्षा निदेशालय में प्रदर्शन कर धरना दिया था। उनका कहना था कि उत्तराखंड में उनका विवाह हुआ है। उन्हें नौकरी में आरक्षण का लाभ देते हुए नियुक्ति दी जाए।
ये शिक्षक हो सकते हैं बर्खास्त
शिक्षक भर्ती में कुछ ऐसे अभ्यर्थी भी शामिल हैं। जिसने अन्य राज्यों से डीएलएड के लिए स्थायी निवास की बाध्यता के बावजूद डीएलएड करने के बाद उत्तराखंड में नियुक्ति पा ली। जबकि नियुक्ति के लिए उत्तराखंड का स्थायी या मूल निवासी होना जरूरी है।
ये भी पढ़ें...Kedarnath By-Poll: भाजपा ने पूर्व विधायक आशा नौटियाल पर फिर जताया भरोसा, जानें कैसी रही है अब तक सियासी पारी
कुछ अभ्यर्थियों ने यूपी का जाति प्रमाण पत्र रद्द करवाने के बाद उत्तराखंड से जाति एवं निवास प्रमाण पत्र बनवाया है। उनके पति के आधार पर यह प्रमाण पत्र बना है। जिसे डीएम ने जारी किया है। इनके आरक्षण के मामले में समाज कल्याण, कार्मिक और न्याय से परामर्श शासन को मिल चुका है, लेकिन अभी निदेशालय को कोई निर्देश जारी नहीं हुआ। -आरएल आर्य, अपर निदेशक प्रारंभिक शिक्षा