मामले में अभियोग दर्ज करने और विवेचना के बाद अभियुक्त के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया गया था। सुनवाई के दौरान जिला एवं सत्र न्यायाधीश/ विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण नरेंद्र दत्त ने मामले में दोषी पाए गए पेशकार को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 7 के तहत तीन साल का कठोर कारावास और दस हजार के जुर्माने की सजा सुनाई।
जुर्माना नहीं भरने पर छह माह की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी। धारा 13 (1) डी, 13(2) के तहत अभियुक्त को सात साल के कठोर कारावास व पचास हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। जुर्माना नहीं भरने पर अभियुक्त को एक वर्ष के अतिरिक्त साधारण कारावास की सजा भुगतनी होगी।