दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई महानगरों में भारी वायु प्रदूषण के बीच वैज्ञानिकों का एक और चौंकाने वाला शोध सामने आया है। आगे पढ़िए...
पर्यावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड (सीओ2) की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि अब समुद्र और पेड़ इसका केवल 25 प्रतिशत हिस्सा ही सोख पा रहे हैं। दून पहुंचे समुद्री मोतियों के विशेषज्ञ वैज्ञानिक डा. अजय कुमार सोनकर ने बताया कि इस बदलाव से फल-सब्जियों की मूल संरचना 50 साल के भीतर बदल गई है।
विटामिन और न्यूट्रिएंट्स का अनुपात फल-सब्जियां में अब वह नहीं रहा जो पहले स्वस्थ वातावरण में हुआ करता था। डा. अजय सोनकर ने बताया कि पेड़-पौधे और समुद्र को कार्बन सिंक कहा जाता है। यह दोनों वातावरण से कार्बन डाई ऑक्साइड ग्रहण करते हैं। पौधे सूरज की रोशनी में सीओ2 से ऑक्सीजन अलग करके वातावरण में छोड़ देते हैं।
फल-सब्जियों के माइक्रो न्यूट्रिएंट्स और विटामिन्स की मात्रा अब बहुत कम हो गई
किसी भी पौधे का 50 प्रतिशत भाग कार्बन होता है। जब वातावरण में सीओ2 का प्रसार बढ़ जाता है तो संतुलन बनाने के लिए समुद्र वातावरण से सीओ2 सोखने लगता है। समुद्री जीव कार्बन और ऑक्सीजन को पानी से लेकर उन्हें कैल्शियम के साथ कंबाइंड करके कैल्शियम कार्बोनेट बनाते हैं।
इसी से मूंगे के पर्वत सीप शंख का निर्माण होता है और मोती भी इनमें से एक है। लेकिन वर्तमान परिस्थिति में पेड़-पौधे और समुद्र केवल 25 प्रतिशत सीओ2 ही सोख पा रहे हैं। बाकी का आधे से ज्यादा सीओ2 पर्यावरण में जा रहा है जो कि शताब्दियों तक रहेगा। वातावरण में सीओ2 की अधिक मात्रा की वजह से पेड़-पौधों को अधिक कार्बन-डाई-ऑक्साइड सोखनी पड़ रही है।
जिससे उनकी संरचना बदल रही है। इससे फल-सब्जियों के माइक्रो न्यूट्रिएंट्स और विटामिन्स की मात्रा अब बहुत कम हो गई है। डा. अजय सोनकर के मुताबिक 50 वर्षों के भीतर यह संरचना का बड़ा परिवर्तन सामने आया है। अधिक कार्बन की वजह से पेड़-पौधों में कीड़े ज्यादा लगते हैं, जिससे पेस्टीसाइड्स का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है।
एक हेजर्ड गैस चैंबर है दिल्ली की सड़क
इससे भोजन और जहरीला होता जा रहा है। कार्बन ज्यादा सोखने के लिए पौधे को पानी की भी ज्यादा आवश्यकता पड़ती है। इससे भू-जल स्तर भी प्रभावित हो रहा है। डा. सोनकर ने बताया कि अगर समय रहते पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण न किया गया तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
चार सदस्यीय परिवार के लिए दो परिपक्व पेड़ जरूरी
डा. अजय सोनकर के मुताबिक चार सदस्यों वाले एक परिवार के लिए दो परिपक्व पेड़ जरूरी हैं। दो पेड़ों से उनकी ऑक्सीजन की पूर्ति हो सकती है। लेकिन देश में तेजी से पेड़ काटकर मास्क कल्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो बेहद खतरनाक है। इससे समस्याएं और बढ़ने वाली हैं।
दिल्ली में पर्यावरण प्रदूषण के सवाल पर डा. अजय सोनकर ने बताया कि दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स हाल ही में 900 के पार पहुंच गया था। यानी अगर आप दिल्ली की सड़क पर हैं तो मतलब एक हेजर्ड गैस चैंबर में हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि दिल्ली जैसे शहरों में कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा करने के माध्यम खतरनाक रूप से बहुत ज्यादा हैं कार्बन सोखने वाले पेड़ों की संख्या बेहद कम है।
पोर्ट ब्लेयर में प्रदूषण नगण्य
दुखद ये है कि व्यवसायिक संसार इस आपदा में अपने लिए नए बाजार देख रहा है और एक गलत धारणा ये बन रही है कि हम मास्क लगाकर घर में एयर क्लीनर्स लगाकर इस आपदा से बच सकते हैं किन्तु सच्चाई बिल्कुल अलग है। जब किसी कमरे मे एयर क्लीनर लगा होता है तो कमरा हर तरफ से बंद कर दिया जाता है और कमरे में मौजूद लोग कमरे की सीमित हवा में मौजूद आक्सीजन ले रहे होते हैं और कार्बन डाई आक्साइड छोड़ रहे होते हैं।
एक सामान्य मनुष्य 550 लीटर आक्सीजन एक दिन मे कन्ज्यूम करता है और 2.3 पौन्ड कार्बन डाई आक्साइड हवा मे छोड़ता है। इस प्रकार एक सामान्य आकार के बंद कमरे में मौजूद मात्र दो तीन लोग कुछ ही देर में कमरे की कार्बन डाई आक्साइड के स्तर को कई गुना बढा देते हैं जो शरीर में होने वाली आवश्यक जैविक गतिविधियों पर विपरीत प्रभाव डालता है, जिससे हृदय व सांस संबंधी व्याधि हो सकती है।
पोर्ट ब्लेयर में प्रदूषण नगण्य
डा. अजय सोनकर पोर्ट ब्लेयर में मोतियों पर शोध कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वहां एयर क्वालिटी इंडेक्स महज 2.5 है, जिसे लगभग नगण्य प्रदूषण कहा जा सकता है। पोर्ट ब्लेयर में आज भी 98 प्रतिशत जंगल हैं, जिससे भरपूर ऑक्सीजन उपलब्ध है।