आमतौर पर गंगा उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है, जबकि यहां गंगा पूरब से पश्चिम की ओर बहती है। यह स्थान दिव्य है। पौराणिक काल में पांडवों के वंशज यहां मन का पाप धोने के लिए आए थे और इसी स्थान पर गाय के गोबर से बने उपले से खुद मुक्ति प्राप्त की थी।
मान्यता है कि इस स्थान पर अज्ञातवास के दौरान पांच पांडव के आकर ठहर थे। कहा जाता है कि यहां पहुंचने वाले लोगों की मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं।
मंदिर के पुजारी बावन गिरी महाराज ने बताया कि इस पौराणिक स्थान पर हर साल महाशिवरात्रि और गंगा दशहरे पर मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु आकर मत्था टेकते हैं और गंगा में स्नान कर पुण्य कमाते हैं।
जानकारों का कहना है कि इसके पीछे भौगोलिक कारण हैं। लेकिन करीब आधा किलोमीटर तक पूरब से पश्चिम की तरफ बहने के बाद खुद ही उत्तर से दक्षिण की ओर बहने लगती है।