मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना जरूर पूरी होती है। मंदिर का इतिहास 2000 साल से पुराना बताया जाता है। सावन के महीने में यहां सैकड़ों श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना करने पहुंच रहे हैं।
पुरातात्विक खुदाई में मिले इस मंदिर के अवशेषों से यह भी ज्ञात हुआ कि इस क्षेत्र में 100 ईसवी में सभ्यता विद्यमान थी। जानकार बताते हैं मंदिर परिसर में पूर्व में हुई खुदाई के दौरान पुराने मंदिरों के अवशेष भी मिले हैं।
एक किवदंती है कि विशेष पर्व पर देवता भी यहां पूजन करने आते हैं। इस दौरान मंदिर की घंटियां खुद ब खुद बजने लगती हैं। विशेष पर्व पूर्णमासी, शिव चौदस व अमृत सिद्धि योग के दौरान वीरभद्र मंदिर में देवता भी पूजन करने आते हैं।
राजेंद्र गिरि का कहना है कि उक्त पर्वों के दौरान कई बार सुबह घंटियां अपने आप बजती हैं। जिसका आभास उस दौरान मंदिर में मौजूद कई श्रद्धालुओं को हुआ है।
(अमर उजाला अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता। यह खबर केवल लोगों की रुचि का ध्यान में रखकर पेश की गई है।)