देहरादून की रायपुर रोड निवासी जुगनू शर्मा जब 19 साल की थीं तो कैंसर से उनके पिता की मौत हो गई।
पिता की जिम्मेदारियां ओढ़ लीं
इस दौरान कैंसर की बीमारी का पता लगते ही पिता ने आनन-फानन दो बेटियों को ब्याह दिया लेकिन एक बेटी की जिम्मदारी जुगनू पर छोड़ गए। जुगनू भी हालात से हारी नहीं और हौसले के साथ पिता की जिम्मेदारियां ओढ़ लीं।
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समय बीतता गया और जुगनू सारी दुनियादारी छोड़ एक नई दुनिया सजाने-संवारने में लगी रहीं। आज भी उनका बस एक ही मकसद है लोगों की मदद करना। जुगनू अब 48 साल की हैं। मां की सेवा के लिए उन्होंने शादी का इरादा त्याग दिया।
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पिता की मौत के बाद जुगनू ही घर में ऐसी थी जिस पर सारी जिम्मेदारियां छोड़ी जा सकती थीं। ऐसे में मां ने बेटे को छोड़ अपनी इस बेटी को पिता की जगह नौकरी दिलाने का फैसला किया। जुगनू इस समय एमईएस रूड़की में कार्यालय अधीक्षक के पद पर तैनात हैं।
परिवार की सेवा ही उनका मकसद
वह मां को अपने साथ ही रखती हैं। छुट्टी होने पर वह अपने घर दून आती हैं। पिता की मौत के बाद जुगनू ने छोटी बहन को एमए, बीएड, एलएलबी कराई और फिर एक बिजनेसमैन से उसकी शादी कराई।
छोटी बहन संध्या की शादी के समय जुगनू की मां नरेंद्र कुमारी शर्मा ने उस पर भी बहुत दबाव डाला। मां के अपना घर बसाने की बात पर भी जुगनू टस से मस नहीं हुईं। जुगनू ने कहा कि बस परिवार की सेवा ही उनका मकसद है।
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खाली समय वह समाज सेवा में गुजारेंगी। आज भी जब जुगनू की 80 वर्षीय मां से जुगनू का जिक्र होता है तो बस वह यही कहती हैं यह तो मेरी चमत्कारी बेटी है। मेरा बेटा भी है लेकिन मेरी सेवा तो बस जुगनू ही करती है।
जुगनू ने ना सिर्फ बहन को पढ़ाया बल्कि भाई के सुख-दुख में भी उसके साथ खड़ी रहीं। उनका यह मिशन यहीं नही रुका, उन्होंने अपने भतीजे को कंप्यूटर कोर्स कराया और उसकी नौकरी भी लगवाई। भतीजी की शादी भी जुगनू ने ही कराई। यही नहीं जुगनू समाज सेवा और अध्यात्म के क्षेत्र में भी बढ़चढ़ कर भागीदारी निभाती हैं।
गरीबों की पढ़ाई का उठा रही खर्चा
जुगनू ने कुछ गरीब बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा भी उठा रखा है। इनके अभिभावकों को को तो यह तक नहीं पता कि उनके बच्चों बच्चों की फीस कहां से आती है। जुगनू यह काम चुपचाप कर रही हैं।
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वह एक चौकीदार की बच्ची की ट्यूशन फीस का भी खर्च उठाती हैं। जुगनू सफेद रोग से पीड़ित लड़की की भी मदद करती हैं। वह कपड़े लाकर जुगनू को सिलाई के लिए देती हैं। इसके अलावा लाचार और पीड़ितों की मदद करना ही अब उनका मकसद है।