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मैं संत हूं, सौदेबाजी कर ही नहीं सकता: सतपाल महाराज

Sun, 25 Sep 2016 06:55 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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सतपाल महाराज - फोटो : AmarUjala
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धर्म के साथ-साथ राजनीति में दखल रखने वाले सतपाल महाराज की उत्तराखंड राज्य के गठन में अहम भूमिका रही है।
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प्रदेश के गठन के सवाल को लेकर ही वो राजनीति में आए। कांग्रेस में रहे और एनडी तिवारी के साथ कांग्रेस (तिवारी) में भी रहे। पौड़ी गढ़वाल से सांसद रहे, केंद्र में मंत्री भी रहे, लेकिन दो साल पहले कांग्रेस में परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि महाराज को भाजपा का दामन थामना पड़ा।

भाजपा ने उनको राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य भी बनाया है। सतपाल महाराज को भाजपा में शामिल हुए दो साल से अधिक वक्त हो गया, लेकिन पार्टी ने उनको अभी तक कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं सौंपी है। ऐसा कहा जाता है कि फ्लोर टेस्ट के वक्त महाराज कांग्रेस और पीडीएफ में मौजूद अपने शिष्यों को भाजपा के पक्ष में खड़ा नहीं कर पाए थे।
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अगर ऐसा हो गया होता तो प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य कुछ अलग होता। महाराज को कांग्रेस क्यों छोड़नी पड़ी? फ्लोर टेस्ट के वक्त उनके शिष्य भाजपा के पक्ष में क्यों नहीं खड़े हुए? भाजपा में वो अपना राजनीतिक भविष्य कैसा देखते हैं? इन्हीं सब सवालों को लेकर अमर उजाला संवाददाता कृष्णेंदु कुमार ने उनके साथ लंबी बातचीत की। उनके कुछ तीखे सवाल भी किए। उन्होंने जो जवाब दिए आप भी पढ़ें...

आपका धार्मिक कद इतना ऊंचा है। देश-दुनिया में आपके प्रशंसक हैं तो आपको राजनीति में आने की जरूरत क्यों महसूस हुई? 
- मैंने बदरीनाथ से दिल्ली तक पदयात्रा की है। इसमें मैंने देखा कि राजनीति में आकर राज्य को बनाया जा सकता है। उत्तराखंड संघर्ष समिति के दो संयोजकों में से एक मैं भी रहा हूं। प्रदेश और देश के हित के लिए मैं राजनीति में आया। जब में केंद्र में रेल राज्यमंत्री बना तो मैं उत्तराखंड के लिए रेल प्रोजेक्ट लेकर आया। 

ऐसी कौन सी वजह रही, जिसके चलते आपको कांग्रेस छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा? 
- उत्तराखंड से केंद्र में एनडी तिवारी और ब्रह्मदत्त जी के बाद मैं मंत्री रहा। मैंने सोनिया जी और कांग्रेस के अन्य मित्रों से कहा कि मुझे वरिष्ठता के मुताबिक जिम्मेदारी दी जाए, तो उनका कहना था कि आप तो हिंदू फेस हो आपको मंत्री कैसे बनाएं? इसके बाद मेरी पत्नी भी अंबिका सोनी से मिली थीं। उन्होंने भी कहा था कि महाराज जी को कोई जिम्मेदारी सौंपी जाए, तो उनका जवाब भी यही था कि मैं हिंदू फेस हूं। जबकि कांग्रेस के जितने बड़े नेता हैं सब मेरे ही आशीर्वाद से जीतते थे। चाहे जितिन प्रसाद हो, गिरिजा व्यास हो या फिर कमलनाथ मैं सबके क्षेत्र में जाता था। जब मैंने देखा कि कांग्रेस के अंदर भेदभाव है, तो मैंने कांग्रेस को तिलांजलि देना ही बेहतर समझा। इस तरह का भेदभाव भाजपा में नहीं है। 

भाजपा ने भी तो पिछले दो साल के दौरान एक तरह से आपको घर बैठा दिया है ? 
- नहीं उनके दिमाग में कुछ होगा, कुछ सोच रहे होंगे। मुझे राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य भी बनाया। पार्टी नेता व्यस्त भी तो थे। पहले लोकसभा का चुनाव, फिर महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव। सब जगह सरकार भी तो बनानी थी। मुझे तो हेलीकाप्टर और हवाई जहाज दे दिया था, मैं हर जगह गया भी। हमने आपने आप को पार्टी के लिए समर्पित कर दिया है। अब पार्टी सोचेगी मेरा उपयोग किस तरह से करना है।

जिस चीज को मैं निभा नहीं सकता, उसकी जिम्मेदारी क्यों लूं।

- फोटो : AmarUjala
ऐसा कहा जाता है कि फ्लोर टेस्ट वक्त आप अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर सके। अन्य दलों में आपके जो शिष्य थे उनको आप भाजपा के खेमे में लाने में फेल हो गए?  
- ऐसा है जब मैं पार्टी में आया था उस समय कुछ विधायक मेरे पास आए थे। मैंने पार्टी मेें भी बात की थी, लेकिन कोई निर्णय नहीं हो सका। इसके बाद मेरा इन लोगों से कोई संपर्क नहीं रहा। उसके बाद पेपर में निकलता रहा कि महाराज जी अपने चेले लाएंगे। जब पेपर में निकलता है तो यह खबर हरीश रावत जी के पास भी जा रही होगी और एलआईयू के पास भी। मदन सिंह बिष्ट को तो सबने यह कहते हुए सुना है कि सबका बंदोबस्त कर दिया है। सबके चाय-पानी का इंतजाम कर दिया गया है। सब लोग रोके जा चुके थे। जब सब चीजों को खुलेआम कर देंगे तो आपरेशन कैसे सफल होगा? पार्टी के जो निर्देश थे, उसका पालन मैंने किया। स्थितियां क्या बनीं सबको पता है। देखिए, मैं किसी से आग्रह कर सकता हूं, किसी से सौदेबाजी नहीं कर सकता। मैंने अपने आपको सौदेबाजी से दूर रखा है। मैं एक संत हूं। संत की जो विरासत होती है, वह इन चीजों से बड़ी होती है। राजनीति से भी बड़ी होती है। मैं सौदेबाजी नहीं कर सकता हूं। मैंने उनसे आग्रह किया था, उन्होंने अस्वीकार कर दिया।

उस वक्त तो आपका एक बयान भी सामने आया था कि अगर मुझे जिम्मेदारी दी गई होती तो स्थिति दूसरी होती? 
- नहीं, नहीं मैंने ऐसा बयान नहीं दिया था। जो बयान था वह व्यंग्यात्मक था कि वो अपनी चेली लाएं और हम अपने चेले लाएंगे। चेला-चेली का बयान था। उसमें ऐसा कुछ नहीं था। मुझे मालूम है, जिस चीज को मैं निभा नहीं सकता, उसकी जिम्मेदारी क्यों लूं। 

क्या आपको नहीं लगता है कि भाजपा में गुटबाजी बढ़ रही है? अगर यह समस्या रही तो पार्टी को लेने के देने पड़ सकते हैं? 
- भाजपा में खेमेबाजी तो कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं हो रही है। हर आदमी स्वतंत्र है अपनी बात कहने के लिए। 

प्रदेश में अब चुनावी माहौल बन गया है। ऐसे में दूसरे दलों में मौजूद आपके भक्त संपर्क में हैं क्या? क्या वो पाला बदल सकते हैं? 
- ऐसा है अब तो उनसे लड़ाई होगी। अब पाला बदलने जैसी कोई बात नहीं है। सब अपने-अपने खेमे में रम चुके हैं लगभग। अब तो सब आमने-सामने होंगे। 

कांग्रेस के पास हरीश रावत का चेहरा है। भाजपा ने अभी तक अपना कोई चेहरा घोषित नहीं किया है। क्या आप पार्टी का चेहरा बन सकते हैं?  
- कांग्रेस के पास हरीश रावत का चेहरा है। भगवान किसी को ऐसा चेहरा न दे जो आरोपों से घिरा एवं दागी हो। भाजपा के बड़े नेता सही मौके पर निर्णय करेंगे, क्योंकि उनके पास फीडबैक आते रहते हैं। हमारे पास बड़े नेताओं की कोई कमी थोड़े ही है, अब तो और भी नेता आ गए हैं हमारे यहां। जहां तक मेरा सवाल है मैं मुख्यमंत्री पद की रेस में नहीं हूं। जहां तक विधानसभा का चुनाव लड़ने का सवाल है, अगर पार्टी कहेगी तो मैं चुनाव लड़ूंगा।
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पांच सालों तक तो तिवारी जी की ढाल बनकर हम ही रहे

सतपाल महाराज - फोटो : अमर उजाला
ऐसा कहा जाता है कि विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत के साथ आपके व्यक्तिगत मतभेद रहे हैं। अब दोनों भाजपा में हैं। उनके साथ एडजस्ट कैसे करेंगे? 
- ऐसा कुछ नहीं है। मैं एक दिन बहुगुणा जी के पास गया था और पूछा कि यह सब क्या हुआ, क्यों हटाए गए? कहने लगे कि भई मुझे इंप्रेशन तो यह दिया गया था कि प्रीतम सिंह को बना रहे हैं, मुझे नहीं पता था कि हरीश को सीेएम बना देंगे। मैंने कहा कि मुझे भी याद कर लिया होता। पांच सालों तक तो तिवारी जी की ढाल बनकर हम ही रहे। कांग्रेस ने तो बहुगुणा को ट्रेलर कुछ और दिखाया, फिल्म कोई और दिखा दी। हमने तो बहुगुणा जी को गैरसैंण में विधानसभा का सत्र बुलाने को कहा था। जब उन्होंने इसकी घोषणा की तो बहुत वाह-वाह हुई। पहाड़ की समस्या पहाड़ पर ही उठाई जानी चाहिए। अधिकारी तो देहरादून से बाहर जाना नहीं चाहते हैं। उनके लिए तो देहरादून स्वर्ग है। 

विधानसभा का चुनाव होने वाला है। आप भी चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं। अमृता जी भी इस कतार में हैं, तो क्या एक परिवार से एक व्यक्ति को टिकट देने की बात लागू नहीं होगी? 
- देखिए, यह पार्टी पर निर्भर करता है कि एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट मिलेगा। जहां तक अमृता जी की बात है वह पहले चुनाव लड़ती रही हैं। अब तक कांग्रेस के टिकट पर विधायक रही हैं। अब वो भाजपा में हैं। यह पार्टी पर निर्भर है कि उनको कहां से टिकट मिलेगा। रामनगर से वो चुनाव लड़ती रही हैं, अब चौबट्टाखाल से भी आवाज आ रही है कि यहां से चुनाव लड़िए। अच्छे नेता की तलाश हर जगह होती है। 

हरीश रावत के कार्यकाल को आप किस रूप में देखते हैं? 
- हरीश रावत की सोच हमेशा से निगेटिव रही है। मैं अब तक सोचता रहा हूं कि उनको इतने झटके क्यों लगे हैं। तुलसीदास की एक चौपाई है करम प्रधान विश्व करी रखा, जो जस करे तस फल चाखा। हरीश रावत ने तो पांच सालों तक तिवारी जी को हिलाए रखा। उनको आराम से काम नहीं करने दिया। बहुगुणा को कुछ समझते ही नहीं थे। मैंने हरीश रावत के बारे में अध्ययन किया है, विरोधी के बारे में हमें जानकारी होनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर मैं यह बताता हूं कि पूरनचंद डंगवाल हरीश रावत के साथ रहते थे। वो रानीखेत से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन अंतिम मौके पर हरीश रावत ने अपने साले को टिकट दिलवा दिया। एक बार हरीश रावत ने यशपाल आर्य को कमरे में बैठा दिया कि अभी आपको अध्यक्ष पद का चार्ज देता हूं। यशपाल आर्य वहां दो-ढाई घंटे तक बैठे रहे और हरीश रावत गायब। हरीश रावत इस तरह के काम करते हैं और इसको मनोविनोद के रूप में लेते हैं।
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