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यहां यमुना नदी को एक पेड़ पर रोक लिया था, जानिए इस कुंड की ऐतिहासिक कहानी...

Sun, 20 Aug 2017 02:08 PM IST
दिनेश रावत/ अमर उजाला, उत्तरकाशी
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कहा जाता है कि जब यमुना नदी गौलोक से निकलकर तीव्र वेग से धरती की ओर आ रही थी तो इसका वेग करने के लिए ऋषियों ने यमुना को जामुन के पेड़ पर थाम लिया था। जानिए इसका महत्व...
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यमुनोत्री धाम से 14 किमी दूर और समुद्रतल से 16500 फिट की ऊंचाई पर स्थित ये ऐतिहासिक और पौराणिक कुंड पर्यटकों से महरूम है।

ग्लेशियर, बुग्याल, ब्रह्म कमल आदि प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस स्थान के सूनेपन को देकखर शासन प्रशासन की कार्यप्रणाली का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस स्थान पर जाने के लिए कई पर्यटक एवं एडवेंचर प्रेमी उत्साहित रहते हैं, परंतु कोई स्थाई ट्रेक रूट न होने की वजह से वे यहां तक पहुंच ही नहीं पाते हैं।       
         
यमुनोत्री मंदिर समिति के जगमोहन उनियाल के अनुसार प्राकृति सुंदरता के अलावा इस स्थान का पौराणिक महत्व भी है। मान्यता के अनुसार जब यमुना नदी गौलोक से निकलकर पृथ्वी पर उतर रही थीं तो उनके वेग से तबाही होने का डर पैदा हो गया था। 
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कुंड पर स्थित जामुन के पेड़ पर सिर्फ एक फल

इसे रोकने के लिए ऋषियों ने उन्हें जामुन के पेड़ पर थाम लिया। इस पेड़ में विशाल आकार का एक ही फल होता है, जो कुंड में गिरकर यमुना की धारा को आगे बढ़ाता है। इसी वजह से यमुना को जमुना नदी भी कहते हैं। माना जाता है कि केवल पवित्र मन वाले लोगों को ही यह अदृश्य पेड़ दिखाई देता है।              

उधर क्षेत्र के मनमोहन उनियाल का कहना है कि उत्तर प्रदेश के वक्त वन विभाग को इस स्थान पर ट्रेक रूट बनाने के लिए बजट आवंटित हुआ था। परंतु पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के बाद ये कार्य अधर में लटक गया। 

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार एवं प्रशासन द्वारा पर्यटन विकास के लिए कई घोषणाएं की जाती हैं परंतु जमीनी हकिकत कुछ और ही है। यमुनोत्री क्षेत्र में धिनाडा बुग्याल, भीम टॉप, संगासू, धरा टॉप जैसे कई पर्यटक स्थल हैं। लेकिन प्रशासन की अंदेखी के चलते यहां का पर्यटन विकास नहीं हो पाया है।  
          
वहीं डीएफओ, जेपी सिंह ने कहा कि विभाग को सप्तऋषि कुंड सहित किसी भी ट्रेक रूट के विकास के लिए कोई बजट नहीं मिला है। हालांकी हमने इस संबंध में शासन में प्रस्ताव भेजा है।
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यहां होता है ऐसा फूल जिसके हैं कई फायदें

ब्रह्म कमल
इस इलाके में उत्तराखंड का राज्य पुष्प ब्रह्म कमल भी होता है। यह फूल औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इसके अंदर से निकलने वाले पानी को अमृत कहा जाता है क्योंकि इसके सेवन से व्यक्ति एकदम से स्पूर्त हो जाता है और उसकी थकान मिट जाती है।

ब्रह्म कमल के फूलों की राख को शहद के साथ मिलाकर खाने से यकृत की वृद्धि रोकने में मदद मिलती है। इसे मिर्गी के दौरे रोकने में भी सहायक माना जाता है और घाव भरने में भी इससे मदद मिलती है। इसे जीवाणुरोधी माना जाता है और इसका इस्तेमाल सर्दी-ज़ुकाम, हड्डी के दर्द आदि में भी किया जाता है।

लोग इसके कपड़ों के बीच डालकर रखते हैं। इसकी मदहोश करने वाली सुगंध से कपड़े महकते रहते हैं और उन पर कीड़े भी नहीं लगते। मूत्र संबंधी रोगों में भी इसका उपयोग किया जाता है। भोटिया जनजाति के लोग तो इसे अपने घरों में लटकाकर रखते हैं क्योंकि उनका मानना है कि यह बीमारियों को आने से रोकता है। वियतनामी लोग इसका सूप बनाकर टानिक के रूप में पीते हैं। तिब्बती लोग इसका उपयोग लकवा और दिमागी रोगों के लिये करते हैं। यह जलोदर (एक रोग जिसमें पेट में पानी जमा हो जाता है) को दूर करने में भी उपयोगी है।
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