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Dehradun News: ल्यूमिनेसेंस डेटिंग में सैपलिंग का विशेष महत्व, रखना होगा विशेष ध्यान

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वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के सहयोग से ल्यूमिनेसेंस डेटिंग और उसके अनुप्रयोग
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अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के सहयोग से ल्यूमिनेसेंस डेटिंग और उसके अनुप्रयोग पर तीन दिवसीय कार्यशाला शुरू हो गई। पहले दिन फील्ड विजिट में प्रतिभागियों को ल्यूमिनेसेंस डेटिंग का कैसे इस्तेमाल कर हजारों साल पहले हो चुकी घटनाओं का समय जानने के लिए कर सकते हैं, उसके बारे में विशेषज्ञों ने बताया। विशेषज्ञों ने कहा कि इस ल्यूमिनेसेंस डेटिंग तकनीक में सबसे महत्वपूर्ण सैंपल एकत्र करना भी होता है। इसमें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
जहां से सैंपल एकत्र करना है, वहां पर सफाई करनी चाहिए। इसके बाद सैंपल लेने के साथ जो ट्यूब इस्तेमाल होती है, उसके प्रयोग से लेकर सैंपल को लैब तक पहुंचाने तक में कई सावधानी बरतनी होती है। अगर सैंपल प्राकृतिक प्रकाश या अन्य किसी प्रकाश में आया, तो उसके खराब होने की आशंका रहती है। ऐसे में सैपलिंग का विशेष महत्व है। विशेषज्ञों ने बताया कि हजारों साल पहले बाढ़, भूकंप आया था, उसका समय ल्यूमिनेसेंस डेटिंग के माध्यम से पता किया जा सकता है। यह विधि काफी प्रभावशाली है। इसके साथ ही प्रतिभागियों को मोहंड क्षेत्र चट्टानों के बारे में विस्तार से बताया गया। इस दौरान डॉ. महेश, डॉ. परमजीत सिंह, डॉ सौरभ सिंघल, डॉ. के ल्यूरी, डॉ सोमदत्त शामिल रहे।
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ल्यूमिनेसेंस डेटिंग से पुराने हथियारों के समय का चला पता
वाडिया संस्थान में चल रही कार्यशाला में शामिल डक्कन काॅलेज डीम्ड यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. शीला मिश्रा कहती हैं कि मध्य प्रदेश के बड़वाह के मेहताखड़ी में खुदाई हुई थी, वहां पर माइक्रोलिथिक हथियार- औजार मिले थे। जब इन हथियारों की अवधि जानने को ल्यूमिनेसेंस डेटिंग विधि का इस्तेमाल किया गया था। तब पता चला था कि वर्ष-2009 में खुदाई के दौरान हथियार चाकू, बाण मिले थे, वह 48 हजार साल पुराने थे। उस समय इंसान पत्थरों को लकड़ी में लगाकर हथियार को तैयार करते थे। प्रो. मिश्रा कहती हैं कि ल्यूमिनेसेंस डेटिंग के माध्यम से 75 हजार साल पुराने समय का पता किया जा सकता है पर इसके इस्तेमाल करने के साथ अन्य पहलू और विकल्पों को देखा जाना चाहिए।
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कुमाऊं में आ चुके दो बड़े भूकंप, खतरा बना हुआ
आईआईटी कानपुर के डिपार्टमेंट ऑफ अर्थ साइंस के प्रो. जावेद मालिक कहते हैं कि कुमाऊं में दो बार बड़े भूकंप आए हैं, इसमें एक भूकंप 1505 में आया था, जो कि आठ और 1803 में 7.7 की क्षमता का आया था। इसके बाद से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है पर एनर्जी अभी मौजूद है इसलिए खतरा बना हुआ है। डॉ. जावेद कहते हैं कि भूकंप के दौरान रप्चर होता है, इसमें चट्टान टूटने की घटना ही होती है। इस रप्चर के माध्यम से टूटे कणों के जरिए ल्यूमिनेसेंस डेटिंग विधि के माध्यम से समय का पता लगाने के किया जा सकता है।
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