कल तक सुभद्रा की पहचान एक गुमनाम, बेसहारा और बीमार वृद्धा की थी। लेकिन, आज वह सुभद्रा पतिर है, जिसका भरापूरा परिवार है। सोशल साइट पर वायरल कराए गए एक वीडियो से हजारों किमी दूर असम के एक छोटे से गांव में सुभद्रा का घर मिला। मां के जिंदा होने की खबर वहां पहुंची तो बेटे दुर्लभ पतिर की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
उसके लिए ये किसी चमत्कार से कम नहीं था। उसने सोशल साइट पर संदेश भिजवाया, ‘मां मैं तुझे लेने आ रहा हूं।’ सुभद्रा देहरादून के नारी निकेतन की संवासिनी है। वह असम के एक सीमांत गांव की रहने वाली है जहां सोलह साल पहले बाढ़ में उसका घर-बार छूट गया था। भटकते-भटकते वह उत्तराखंड कब पहुंची, इसकी उसे सुध नहीं है।
परिवार से बिछड़ी सुभद्रा दिसंबर 2014 से नारी निकेतन में है। वह तब नई टिहरी में बदहवास हालात में मिली थी। असमी होने की वजह से वह संवाद नहीं कर पाती थी। ‘अमर उजाला’ के खुलासे के बाद नारी निकेतन में चली सुधारों की बयार में कई संवासिनियों की घरवापसी हुई। उस सूची में अब सुभद्रा का नाम भी जुड़ जाएगा। सुभद्रा की जिंदगी का ये ‘टर्निंग प्वांइट’ जितना अप्रत्याशित है, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प उसे उसके परिवार से मिलाने की कहानी है। इस कहानी के सूत्रधार हैं अपर सचिव (समाज कल्याण) मनोज चंद्रन।
मनोज बताते हैं कि नारी निकेतन से जब सुभद्रा की सहेलियां एक-एक करके घर लौटने लगीं तो उसको भी घर की याद सताने लगी। उसने घर जाने की जिद की। मगर उसकी जुबान कोई समझ नहीं पा रहा था। इतना भर पता चला की वह असम की है। उन्होंने वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट के असमी शोधार्थी नीरज को बुलाया।