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11 साल बाद भी नहीं बनी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सड़कें

Thu, 26 May 2016 03:29 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
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माओवादियों की गतिविधियों और नेपाल से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को देखते हुए वन क्षेत्रों में सड़कें बनानी की योजना घोटालों की भेंट चढ़ गई।
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11 साल बीत चुके हैं लेकिन वन प्रभागों में सड़कें नहीं बनीं। पहले चरण में जिन सड़कों पर थोड़ा-बहुत काम भी हुआ था, वे पता नहीं कहां चली गईं। आज उनकी निशानदेही भी मुश्किल है। प्रदेश शासन अभी तक किसी की जिम्मेदारी तय नहीं कर पाया है। इस प्रोजेक्ट के मद में जो पैसा दिया गया था उसका भी कुछ पता नहीं कि किसने हजम कर लिया। सड़कें बनाने की जिम्मेदारी इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स इंडिया लिमिटेड (ईपीआईएल) को दी गई थी।

प्रदेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बढ़ती राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के मद्देनजर वन प्रभागों में चौकसी बरतने के लिए यह प्रोजेक्ट 22 सितंबर 2004 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी की कैबिनेट ने पास किया था। तर्क दिया गया था कि नैनीताल, ऊधम सिंह नगर, चंपावत, पिथौरागढ़ के वन प्रभागों में सड़कों के बनने से राष्ट्र विरोधी तत्वों को पकड़ने में आसानी होगी। यह प्रस्ताव प्रमुख वन संरक्षक उत्तराखंड की ओर से तैयार किया गया था।
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सितंबर, 2005 में केंद्रीय निर्माण एजेंसी ईपीआईएल से करारनामा पर दस्तखत भी हो गए। शासन ने दो करोड़ 42 लाख रुपये लोक निर्माण विभाग को देने की हामी भर ली। ईपीआईएल को विभाग की मानीटरिंग में काम करना था। वन क्षेत्रों में 1003 किमी सड़कें बनाने की बात हुई थी। 90 करोड़ रुपये से प्रोजेक्ट की शुरुआत हो गई।

53 करोड़ ईपीआईएल को आवंटन के भी आदेश हो गए। ढाई लाख रुपये ईपीआईएल को करारनामा के वक्त दिए गए थे। पहले चरण में 53 मोटर मार्ग बनने थे। जैसे ही प्रोजेक्ट काम शुरू हुआ घपले-घोटाले का दौर भी शुरू हो गया। फाइलें अटकने लगीं और काम रुक गया। वर्ष 2009 में तत्कालीन विधायक सुरेंद्र सिंह जीना ने सचिव को पत्र लिखकर सड़कों की घटिया निर्माण पर सवाल उठाए।

मामला उछलने पर विभागीय सचिव की अध्यक्षता में बनी कमेटी को जांच दे दी गई। इसमें आईआईटी रुड़की के विशेषज्ञ को भी शामिल किया गया। इस दौरान काम पूरी तरह रुक चुका था और फाइलें ठंडे बस्ते के हवाले थीं।

शासन के किसी को दोषी न ठहरा पाने पर मामला विधानसभा की आश्वासन समिति को दे दिया गया। लेकिन, योजना के मद में जो पैसा दिया गया था कहां गया, पता नहीं चला। विधानसभा आश्वासन समिति के अध्यक्ष मदन कौशिक ने बताया कि शासन से जवाब मांगा गया है।
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