जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में आ रहे बदलाव से अंतरराष्ट्रीय सीमा सुरक्षा के लिए नदियों पर चौकसी बढ़ाना जरूरी हो गया है।
बर्फबारी के स्थान पर इकट्ठी बारिश से नदियों में आने वाली बाढ़ और गर्मियों में पानी बहुत कम हो जाने को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। खासतौर पर नदियों के डाउन स्ट्रीम के क्षेत्रों में इससे तबाही मच सकती है। विज्ञानियों ने अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्रों में नदियों की पल-पल जानकारी रखने के लिए इन्फॉर्मेशन सिस्टम स्थापित करने की जरूरत बताई है।
अंतरराष्ट्रीय चीन और नेपाल सीमा पर नदियों की स्थिति का आकलन जरूरी है। इंडस, ब्रह्मपुत्र चीन के अंदर कैलास-मानसरोवर क्षेत्र से निकलती हैं। इसी तरह सतलज, घाघरा, गंडक, कोसी आदि नदियां चीन से निकलती हैं। इनमें कुछ नदियां नेपाल से होती हुई भारत की सीमा में दाखिल होती हैं।
भारतीय क्षेत्र इन नदियों के डाउन स्ट्रीम में आते हैं। नदियों में अचानक इकट्ठा पानी आने से निचले हिस्सों में तबाही हो सकती है। इसी तरह गर्मियों में इनका पानी रोकने से जल संकट पैदा हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण इकट्ठी बारिश होने से नदियां कुछ ही घंटे में उफना जाती हैं। अगर इनकी सूचना पहले नीचे इलाकों को न दी गई तो अचानक बाढ़ से भारी नुकसान हो सकता है।
वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों ने पिछली बाढ़ों के दौरान यहां के पानी का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि चीन के इलाके में इकट्ठा जल अचानक आ गया था। जलवायु परिवर्तन की ताजा स्थिति को देखते हुए विज्ञानियों ने नदियों के बदलाव के संबंध में अध्ययन शुरू कर दिया है।
जल प्रबंधन पर तीन देशों के बीच कूटनीतिक कार्ययोजना जरूरी है। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फबारी के स्थान पर इकट्ठी बारिश से नदियों में अचानक पानी बहुत अधिक हो जाएगा, जिससे डाउन स्ट्रीम में प्रलय सी स्थिति होगी। गर्मियों में बारिश-बर्फबारी न होने की वजह से पानी सूखेगा जिससे डाउन स्ट्रीम में जल संकट पैदा होगा। ऐसे में नदियों का पानी अंतरराष्ट्रीय संबंधों को निर्धारित करने में अहम बिंदु होगा। सरकार को कूटनीतिक समझौते के तहत तीन देशों के बीच इन्फॉर्मेशन सिस्टम और मॉनीटरिंग सेंटर स्थापित करना होगा।
- डॉ. संतोष राय, वरिष्ठ विज्ञानी, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान