सीधी भर्ती और पदोन्नति के पदों पर आरक्षण रोस्टर को लेकर त्रिवेंद्र सरकार बड़े धर्म संकट में है। आरक्षण पर उदासीन रुख के चलते वह सामान्य और आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों के निशाने पर आ गई है। सामान्य वर्ग के कर्मचारी पदोन्नति पर लगी रोक न हटाए जाने से नाराज हैं तो आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को सरकार के हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एसएलपी जाना नहीं सुहा रहा है। दोनों मसलों पर सरकार की अनिर्णय की स्थिति से नाराज दोनों वर्गों से जुड़े कर्मचारी संगठन आंदोलन की घोषणा कर चुके हैं।
सामान्य वर्ग के कर्मचारी अपने प्रमोशन को और अधिक दिन तक टाले जाने से बेहद आक्रोशित हैं। लिहाजा उनका नेतृत्व कर रहे उत्तराखंड जनरल ओबीसी इम्पलाइज एसोसिएशन ने पहले चरण के आंदोलन की घोषणा कर दी है। इसकी शुरुआत मंगलवार को पूरे प्रदेश में जिला मुख्यालयों पर सांकेतिक धरने से होने जा रही है। उत्तराखंड अधिकारी कर्मचारी समन्वय मंच पहले ही आंदोलन का कार्यक्रम जारी कर चुका है। उसके आंदोलन की शुरुआत छह जनवरी से होगी। सामान्य वर्ग के कर्मचारी संगठनों के आंदोलन के जवाब में उत्तराखंड एससी एसटी इम्पलाइज फेडरेशन ने भी कमर कस ली है।
उसने 28 दिसंबर से सीधी भर्ती और प्रमोशन में आरक्षण रोस्टर को लेकर आंदोलन करने का फैसला किया है। कर्मचारी संगठनों के आंदोलित तेवरों के चलते सरकार असमंजस की स्थिति में है। वह न तो प्रमोशन पर लगी रोक हटाने का साहस कर पा रही है न ही एससी एसटी कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व को लेकर पूर्व में गठित इरशाद हुसैन आयोग और इंदु कुमार समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर रही है। धर्मसंकट में फंसी सरकार को अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का आसरा है। सुप्रीम कोर्ट को विचाराधीन एसएलपी की सुनवाई 15 जनवरी को करनी है।
प्रदेश सरकार इसी तिथि पर निर्णय की उम्मीद कर रही है, इसलिए मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश ने सभी विभागों के प्रशासनिक सचिवों से आग्रह किया है कि सुनवाई से पहले वे अपने-अपने विभागों में संबंधित प्रकरण से जुड़ी एसएलपी या अपीलों का ब्योरा शासन को भेज दें। मगर कर्मचारी 15 जनवरी तक इंतजार करने को तैयार नहीं है, इसलिए वे सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन पदोन्नति पर लगी रोक को तत्काल हटाने की मांग कर रहे हैं।
15 दिसंबर को हाईकोर्ट ने एसएलपी पर जो फैसला दिया है, उसके आधार पर सरकार पदोन्नति पर लगी रोक हटा सकती है। हम सरकार से मांग कर रहे हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन प्रमोशन खोल दे। सैकड़ों कर्मचारियों को बगैर प्रमोशन सेवानिवृत्ति हो जाने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। सरकार ने हमें आंदोलन करने को बाध्य किया है।
- दीपक जोशी, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखंड जनरल ओबीसी इम्पलाइज एसोसिएशन
हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद सरकार को इंदु कुमार समिति व इरशाद हुसैन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर प्रमोशन रोस्टर पर निर्णय करना चाहिए था। लेकिन वह हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी में चली गई। सरकार को तत्काल एसएलपी वापस लेनी चाहिए। साथ ही जब तक कौशिक समिति आरक्षण रोस्टर का निर्धारण नहीं करती है, तब तक सीधी भर्ती पर भी रोक लगाई जाए। सरकार के उदासीन रुख ने हमें आंदोलन करने को मजबूर किया है।
-करम राम, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखंड जनरल ओबीसी इम्पलाइज फेडरेशन
सरकार कर्मचारियों के धैर्य की परीक्षा ले रही है। न्यायालय ने कभी नहीं कहा कि प्रमोशन पर रोक लगा दो। ये निर्णय सरकार का था, इसलिए उसे इसे तत्काल वापस लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के आलोक में उसे बगैर आरक्षण के प्रमोशन पर लगी रोक को हटाना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करेगी तो तय कार्यक्रम के अनुसार कर्मचारी आंदोलन पर चले जाएंगे।
- पूर्णानंद नौटियाल, प्रदेश प्रवक्ता, उत्तराखंड अधिकारी कर्मचारी समन्वय मंच