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शैलाटांग फतह की याद ताजा कर पूर्व सैनिकों में भरा जोश

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शिमलाबाई पास रोड स्थित एक गेस्ट हाउस में आयोजित शेलाटांग दिवस के अवसर पर उपस्थित तीन पैरा के पूर्
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थल सेना की स्पेशल फोर्स तीन पैरा के पूर्व सैनिकों ने 72वां शेलाटांग दिवस धूमधाम से मनाया। इस दौरान पूर्व सैनिकों ने शैलाटांग फतह की यादों को ताजा किया। वर्ष 1947 में पाक से युद्ध के दौरान तीन पैरा के जवानों ने शैलाटांग फतह की थी। इस दौरा तीन पैरा के जवानों ने दुश्मन सेना के सैकड़ों जवानों की जान ली थी। तब से बटालियन इस दिन को वार डे के रूप में मनाती है।
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बृहस्पतिवार को प्रदेशभर से बटालियान के रिटायर जवान ट्रांसपोर्टनगर रोड स्थित गेस्ट हाउस में जुटे। जहां सबसे पहले शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। समारोह में पूर्व सैनिकों ने युद्ध और नौकरी के दौरान के अनुभव साझा किए। वीर नारी सरिता गुरुंग, अनिता और हरिकला थापा के साथ ही समारोह में शामिल बटालियन के अफसर रहे कैप्टन सीएम गुरुंग की पत्नी कमला गुरुंग और ब्रिगेडियर बीपीएस खाती की पत्नी नीलम खाती को सम्मानित किया गया।
इस दौरान ब्रिगेडियर बीपीएस खाती ने बताया कि वर्ष 1947 में पाकिस्तान ने कबालियों की मदद से भारत पर हमला कर दिया था। वह श्रीनगर से 14 किमी दूरी पर स्थित शैलाटांग तक पहुंच चुके थे। उनका अगला टारगेट श्रीनगर था, लेकिन पैरा के जवानों ने कबालियों को मुंहतोड़ जवाब दिया और शैलाटंाग पोस्ट को मुक्त कर उन्हें वहां से खदेड़ दिया। इस दौरान जवानों ने करीब 300 कबालियों को मार गिराया था और श्रीनगर को कबालियों के हाथों से बचाया था। इस दौरान उनके भी कई सैनिक शहीद हुए थे।
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सूबेदार मेजर आनंद सिंह रांगण ने बताया कि 207 वर्ष पूर्व बटालियन की स्थापना हुई थी। तब इसे रसल ब्रिगेड नाम दिया गया था। इसके बाद निजाम हैदराबाद और फिर 1-कुमाऊं रेजीमेंट नाम दिया गया। बाद में बटालियन का नाम तीन पैरा स्पेशल फोर्स रखा गया। बटालियन को 1947 के युद्ध के बाद 55 पदक मिले थे। इनमें तीन महावीर और नौ वीर चक्र थे। इसके बाद लड़े गए युद्धों में भी बटालियन अपना लोहा मनवा चुकी है। समारोह में कर्नल डीएस भंडारी (सेनि.), ऑनरेरी कैप्टन सीएम गुरुंग, ऑनरेरी कैप्टन एनएस कुंवर, सूबेदार मेजर एमएलएस नेगी, सूबेदार आरके सिंह, नायक हिम्मत धामी समेत पूर्व सैनिकों की पत्नियां भी शामिल रहीं।
युद्ध के साक्षी 96 वर्षीय हिम्मत सिंह धामी ने भर दिया जोश
समारोह में 96 वर्षीय हिम्मत सिंह धामी भी मौजूद रहे। वह ऐसे व्यक्ति हैं जो 1947 युद्ध के साक्षी हैं। उन्होंने उस समय के बारे में बताते हुए कहा कि वह श्रीनगर से पुंछ की तरफ जा रहे थे। इसी दौरान पाकिस्तान की ओर से बीच में अंबुश लगाया था। जिसमें वह फंस गए थे। कंपनी कमांडर ने बचने के लिए कहा था। जिसके बाद किसी तरह उन्होंने पहाड़ी पर चढ़कर जान बचाई थी। बाद में कबालियों की घेराबंदी कर सभी को मार गिराया था और उन्हें शैराटांग पोस्ट से खदेड़ दिया गया। इस दौरान उन्हें गोली भी लगी थी, जिसमें वह बुरी तरह से जख्मी हो गए थे।
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