भागीरथी इको सेंसिटिव जोन के जोनल मास्टर प्लान के मामले में उत्तराखंड शासन एक बार फिर नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) में शपथ पत्र दाखिल करेगा। इसके लिए शासन ने तैयारी शुरू कर दी है।
एनजीटी की गत दिवस हुई सुनवाई में केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अपना पक्ष ही नहीं रखा। ट्रिब्युनल ने अगली सुनवाई में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से अपना पक्ष रखने के लिए कहा है।
भागीरथी इको सेंसिटिव जोन के जोनल मास्टर प्लान के संबंध में केंद्रीय मंत्रालयों की आपत्ति से मामला उलझता जा रहा है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने पहले ढील दी और नया जोनल मास्टर प्लान तैयार करने के लिए कहा।
जब जोनल मास्टर प्लान तैयार हो गया तो केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने इस पर आपत्ति कर दी। फिर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री अनिल कुमार दबे ने कहा कि दोनों मंत्रालय संयुक्त शपथ पत्र एनजीटी में दाखिल करेंगे।
इसके बाद जब सुनवाई हुई तो केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय का पक्ष एनजीटी में नहीं रखा गया। इस पर ट्रिब्युनल ने पक्ष रखने के लिए सख्ती से निर्देश जारी किए हैं। केंद्र के इस रवैये से भागीरथी इको सेंसिटिव जोन के विकास कार्यों का मामला लटक जा रहा है।
बता दें कि केंद्रीय जलसंसाधन मंत्रालय ने नए सिरे से जोनल मास्टर प्लान तैयार करने के लिए कहा था। इस पर प्रदेश शासन ने विभागों के साथ समन्वय बैठकें शुरू कर दीं, लेकिन केंद्रीय मंत्रालयों के इस ढुलमुल रवैये को देखकर प्रदेश शासन ने तय किया है कि एक बार फिर वह पुराने जोनल मास्टर प्लान के संबंध में एनजीटी के समक्ष अपना पक्ष रखेगा।