भारत-पाकिस्तान के बंटवारे को भले ही सालों बीत गए हो, लेकिन कुछ जख्म अब भी हरे हैं। कुछ ऐसा ही दर्द रिफ्यूजी (पंजाबी कॉलोनी) निवासी सरदार मंजीत सिंह बेदी के सीने में भी दफन था। जो कुछ अब 70 साल बाद उमड़ पड़ा। आगे पढ़िए पूरी कहानी...
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दस्तावेज हाथ लगे तो शुरु हुई दौड़-धूप
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दरअसल यह दर्द तब सामने आया जब मंजीत को बंटवारे के बाद वे देहरादून आ गए और उनके पास कुछ भी नहीं था। तब से वे मुआवजे के लिए भटक रहे हैं। मंजीत के अनुसार उनके पिता ने पूर्वी पंजाब के रिफ्यूजी क्लेम रजिस्ट्रार के पास अपनी प्रॉपर्टी के लिए क्लेम प्रस्तुत किया था।
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एक समाचार पत्र के मुताबिक, पंजाब सरकार ने इसे सही मानते हुए उनके पिता के नाम 12 जून 1948 को पचास हजार रुपये स्वीकृत किए गए थे। लेकिन तब वे उसे मुआवजा कैश नहीं करवा पाए। इसके बाद उनके पिता की मौत हो गई और हम सब कुछ भूल गए।
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मंजीत के परिवार के नाम पंजाब सरकार ने 1948 में पचास हजार रुपये का मुआवजा स्वीकार किया था। जबकि अब उन्होंने इस रकम को ब्याज सहित दो करोड़ 56 लाख तक पहुंचने का हिसाब लगाते हुए मुआवजा मांगा है। मंजीत इन दिनों विकासनगर में फोटो फ्रेमिंग का काम करते हैं।
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हाल ही में मंजीत देहरादून में एडीएम प्रशासन अरविंद पांडेय के पास पहुंच गए और पूरी कहानी सुना दी। बकौल मंजीत पाकिस्तान के छावनी शहर एबटाबाद में उनके पिता स्वर्गीय दयाल सिंह के पास सौ बीघा से अधिक जमीन और कोठी थी। जब विभाजन हुआ तो उन्हें सब कुछ छोड़ रातोंरात भारत आना पड़ा। इसके बाद वे पटियाल से विकासनगर आ गए।
दो साल पहले घर में उन्हें जब उस मुआवजे के दस्तावेज हाथ लगे तब उन्होंने इसके लेने के लिए शुरुआत की। इस क्रम में वह पीएमओ, मुख्यमंत्री कार्यालय को भी चिट्ठी लिख चुके हैं। पीएमओ ने राज्य सरकार को इस मामले में कार्रवाई के लिए कहा है।