उत्तराखंड में कांग्रेस के नौ असंतुष्टों को सदस्यता के मामले में यदि उच्च या उच्चतम न्यायालय से राहत नहीं मिली तो सूबे के सियासी घमासान में सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं का होगा। क्योंकि ऐसी स्थिति में किसी भी दल की सरकार के गठन पर इन नौ में से कोई मंत्री नहीं बन सकेगा।
संविधान का अनुच्छेद 191 (2) कहता है कि जो विधायक अयोग्य ठहराया गया है, वह चालू विधानसभा के कार्यकाल में चुनाव नहीं लड़ सकेगा। मसलन, आगामी आम चुनाव तक इन सभी के चुनाव लड़ने पर रोक रहेगी। हालांकि एक दावा यह भी किया जा रहा है कि मंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन अगले छह महीने में चुनाव जीतकर आना होगा।
वहीं, संविधान कहता है कि योग्य व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकता है और इन सभी को मौजूदा विस कार्यकाल के लिए चुनाव के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है। सवाल यही है कि जब कोई व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए ही अयोग्य है तो मंत्री कैसे बन सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 191 (2) कहता है कि दल बदल विरोधी कानून के तहत यदि स्पीकर द्वारा किसी सदस्य को अयोग्य घोषित किया जाता है, तो वह उस विधानसभा के कार्यकाल में चुनाव नहीं लड़ सकेगा।
मतलब साफ है कि सदस्यता खो चुके कांग्रेस के नौ असंतुष्टों को यदि किसी हायर कोर्ट से राहत नहीं मिली तो सर्वाधिक नुकसान इन्हीं को होगा। क्योंकि यदि चालू विधानसभा में ये सब चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। गंभीर बात यह है कि इनकी सदस्यता जाने के बाद जो सीटें रिक्त होंगी, उन पर होने वाले उप-चुनाव में ये असंतुष्ट चुनाव नहीं लड़ सकते।
भाजपा के साथ गए कांग्रेस के असंतुष्ट विजय बहुगुणा, हरक सिंह रावत, शैलेंद्र मोहन सिंघल, कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन, शैला रानी रावत, उमेश शर्मा काऊ, प्रदीप बत्रा, अमृता रावत, सुबोध उनियाल को यदि उच्च या उच्चतम न्यायालय से राहत नहीं मिली तो इस विधानसभा के कार्यकाल में किसी राजनीतिक दल की सरकार गठित होने की स्थिति में ना तो इनमें से कोई मंत्री बन सकेगा और ना ही खुद की रिक्त सीटों पर उप-चुनाव लड़ सकेंगे।