उत्तराखंड गठन के 15 साल बाद भी 62 परिवारों का थलीगांव बुनियादी सुविधाओं को मोहताज है। यहां के लोग बल्लियों के सहारे जान जोखिम में डालकर कमल नदी को पार करते हैं।
यही उनके आवाजाही का एकमात्र रास्ता है। गांव में बेसिक और जूनियर हाईस्कूल तो है, लेकिन नदी पर पुलिया न होने और ढाई किमी लंबी तंग चट्टानी पगडंडी के चलते अध्यापक कभी कभार ही स्कूल आते हैं।
इसके चलते सक्षम लोग तो नौगांव में कमरा लेकर अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं, लेकिन गांव के 26 अनुसूचित जाति एवं अन्य गरीब परिवार के बच्चे यहीं के स्कूलों में पढ़ने को मजबूर है। इनकी पढ़ाई का हाल यह है कि आठवीं कक्षा में होने के बावजूद ये बच्चे ढंग से किताब तक नहीं पढ़ पाते।
कृषि और पशुपालन से अपना गुजर-बसर कर रहे इस गांव के मात्र सात लोग ही सरकारी व गैर सरकारी सेवा में है। थली गांव पुरोला-आराकोट मोटर मार्ग से मात्र तीन किमी की दूरी पर है। बावजूद इसके स्वास्थ्य कर्मी भी यहां गर्भवती महिला और नवजात शिशुओं के टीकाकरण के लिए नहीं आ-जा रहे।
जो बच्चे नौगांव में पढ़ने को जाते हैं वे भी उफनती कमल नदी में बल्लियां बह जाने से कई बार स्कूल तक नहीं पहुंच पाते। यहां के लोगों की ढाई किमी नीचे साडा में खेती की जमीन है, जो उपजाऊ भी है। लेकिन पुलिया न होने से कई किमी का अतिरिक्त चक्कर काटकर कुछ लोग ही नकदी फसल को बाजार तक पहुंचा पाते हैं।
साडा के पास ही कुछ बंजर जमीन है, किंतु कोई सरकारी विभाग गांव में आकर ग्रामीणों को इस बाबत सलाह-सहारा देने को तैयार नहीं। 2500 मीटर की ऊंचाई पर मसाऊ तोक में लगे सेब के बगीचे भी जानकारी के अभाव में बर्बाद हो चले हैं।
गांव के अमीन सिंह, आनंद सिंह तथा मोहन सिंह बताते हैं कि यहां के लोग अभी भी पारंपरिक फसल मंडुआ, झंगोरा, चौलाई, मक्की और गेहूं की फसल उगाते हैं। कुछ परिवारों ने मटर-टमाटर की फसल उगाई भी, लेकिन कमल नदी और यमुना से कटाव के कारण वह बर्बादी के कगार पर पहुंच गई।
बड़ी बात यह है कि थली गांव में आज तक किसी जनप्रतिनिधि या अफसर के कदम नहीं पड़े हैं। गांव वालों की 20 वर्षों से साडा में पुलिया बनाने और यहां से गांव तक वैकल्पिक सड़क बनाने की मांग भी अनसुनी की जा रही है।