अचानक वह निढाल हो गईं। उनका माथा रेहल पर रखे कुरान पर टिक गया। बहुओं ने उन्हें इस हालत में देखा तो उठाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक उनका इंतकाल हो चुका था। देर रात तरावीह के बाद बौंगे शाह के कब्रिस्तान में शकूरन को सुपुर्द ए खाक किया गया। उनके पति हाफिज मुस्तफा ने जनाजे की नमाज पढ़ाई।
शहर इमाम मुफ्ती मुनाजिर हुसैन का कहना है कि एक न एक दिन सभी को मरना है, लेकिन ऐसी मौत खुशनसीबों को मिलती है। रमजान के मुकद्दस महीने में रोजे की हालत में कुरान की तिलावत करते हुए रूह परवाज होना खुदा की खास रहमत की निशानी है। ऐसे ही लोगों के लिए दुनिया और आखिरत (परलोक) की कामियाबी की खुशखबरी है।