‘नदियां वापस नहीं लौटतीं, फिर खड़े नहीं होते टूटे पहाड़। पहाड़ों से बह गए लोग फिर नहीं लौट पाते हैं वापस, नदी की तरह।’
रमेश कुड़ियाल की कविताओं में इस्तेमाल किए गए बिंब पहाड़ी जिंदगी की सख्तियों को निगाह के सामने ला देते हैं। शनिवार दोपहर उनके काव्य संकलन ‘काफल बेचते बच्चे’ का विमोचन साहित्यकार मंगलेश डबराल ने मीडिया सेंटर में किया।
इस मौके पर मंगलेश डबराल ने कहा कि कुड़ियाल की कविताओं में मौलिकता और गहराई है। कविताओं में इस्तेमाल किए गए बिंबों ने उनका बचपन याद दिला दिया। गांव की याद आ गई। वो शब्द याद आ गए जिनका लड़कपन में हम खूब इस्तेमाल करते थे।
इस मौके पर रमेश कुड़ियाल ने अपनी पांच कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता अतुल शर्मा ने की थी। इस मौके पर रंजना शर्मा, डा. महेश कुड़ियाल, जगमोहन पंवार, वीरेंद्र पैन्युली, जेएस रावत, राजेश सकलानी, शिव प्रसाद जोशी, श्रीकृष्ण भट्ट, मनीष आदि रहे।