शहीदेआजम सरदार भगत सिंह पर लाहौर कोर्ट में चले ट्रायल का हिंदी अनुवाद और प्रकाशन नहीं हो सकेगा। कोर्ट ट्रायल के अनुवाद और प्रकाशन पर लाहौर हाईकोर्ट ने अड़ंगा लगा दिया है।
भगत सिंह और उनके साथियों पर चले कोर्ट ट्रायल की प्रतिलिपि हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी विवि में उपलब्ध है। गुरुकुल प्रशासन की ओर से ट्रायल का हिंदी अनुवाद कराने की शुरुवात भी की गई थी लेकिन अब पूरी प्रक्रिया पर ब्रेक लग गया है।
गुरुकुल कांगड़ी विवि की ओर से वर्ष 2009 में लाहौर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर ट्रायल की सत्यापित प्रतिलिपि हासिल की गई थी। वर्ष 2012 में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की ओर से उर्दू और अंग्रेजी में उपलब्ध कोर्ट ट्रायल का हिंदी में अनुवाद कराने का काम शुरु कर दिया गया था।
पाकिस्तानी विद्वान की मदद से हो रहा था अनुवाद
विश्वविद्यालय की योजना इसे तीन खंडों में प्रकाशित करने की थी। तब उम्मीद बंधी थी कि शहीदेआजम सरदार भगत सिंह पर लाहौर कोर्ट में चले केस की कार्यवाही देशवासियों को हिंदी में पढ़ने को मिलेगी। प्रतिलिपि के हिंदी अनुवाद के लिए पाकिस्तान के एक विद्वान की मदद ली गई।
उन्होंने करीब दो साल तक विश्वविद्यालय में रहकर प्रतिलिपि के हिंदी अनुवाद का काम भी किया। 11 सितंबर 1930 को लाहौर कोर्ट ने भगत सिंह और उनके साथियों पर आरोप तय किए थे। शुक्रवार को शहीदेआजम पर आरोप तय होने की बरसी थी।
गुरुकुल कांगड़ी विवि के कुलपति डॉ. सुरेंद्र कुमार की ओर से कोर्ट ट्रायल के हिंदी अनुवाद और प्रकाशन की औपचारिकताओं पर विश्वविद्यालय के संबंधित अधिकारियों से जानकारी ली गई। रिकार्ड खंगाला गया तो पता चला कि लाहौर हाईकोर्ट की ओर से लगाई गई शर्त के चलते इसका अनुवाद और प्रकाशन नहीं हो सकता है।
संग्रहालय में देखी जा सकती है सुनवाई की प्रतिलिपि
कोर्ट ट्रायल की प्रतिलिपि को गुरुकुल कांगड़ी विवि की ओर से पुरातत्व संग्रहालय में रखा गया है। विवि परिसर स्थित संग्रहालय में किसी भी कार्यदिवस में प्रतिलिपि को देखा जा सकता है। संग्रहालय के निदेशक डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि कोर्ट ट्रायल की प्रतिलिपि को संग्रहालय में आमजन के दर्शनार्थ रखा गया है।
इनका है कहना
विश्वविद्यालय के अधिकारियों के साथ इस विषय पर चर्चा की गई। कोर्ट ट्रायल के हिंदी अनुवाद और प्रकाशन के बीच लाहौर हाईकोर्ट की शर्तें आ गई हैं। विश्वविद्यालय स्थित पुरातत्व संग्रहालय के निदेशक डा. प्रभात कुमार की ओर से बताया गया है कि लाहौर हाईकोर्ट ने ट्रायल का किसी भी भाषा में अनुवाद और प्रकाशन नहीं करने की शर्त लगाई है। जिसके चलते इसका अनुवाद और प्रकाशन नहीं हो सकता है।
-डा. सुरेंद्र कुमार, कुलपति गुरुकुल कांगड़ी विवि हरिद्वार
मुकदमें में कब क्या
- पांच मई 1930 को प्रारंभ हुआ कोर्ट ट्रायल।
- 11 सितंबर 1930 को तय हुआ आरोप।
- 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को दी गई फांसी।
- 1659 पन्नों पर लिखी गई कोर्ट की कार्यवाही।