केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में 100 जन औषधि केंद्र खोलने पर सहमति जताई है, जिसे इन दिनों मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत मंचों पर जाकर खूब प्रचारित कर रहे हैं।
उनके अनुसार, इन केंद्रों के खुलने से गरीब मरीजों को जेनेरिक दवाएं आसानी से कम कीमत पर मिल सकेंगी। लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार की लापरवाही के चलते राजधानी का एकमात्र जन औषधि केंद्र बंदी के कगार पर है। सरकार या किसी सरकारी नुमाइंदे के पास इतना वक्त नहीं कि वह बदहाल पड़े इस केंद्र की सुध ले।
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज टीचिंग अस्पताल (तब दून अस्पताल) में करीब तीन वर्ष पहले जेनेरिक दवाओं का जन औषधि केंद्र खोला गया था। इस केंद्र में गरीब और अभावग्रस्त मरीजों को कम कीमत पर जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने का दावा किया गया। केंद्र में सस्ती दवाएं मिलने से मरीजों को फायदा भी मिला। लेकिन कुछ समय बाद ही यहां दवाओं का टोटा होने लगा। तब से केंद्र उसी बदहाल दशा में संचालित हो रहा है। पर्याप्त दवाएं न होने के कारण मरीजों को मजबूर होकर बाजार से महंगे दाम पर दवा खरीदनी पड़ रही है।
सूत्रों के अनुसार, केंद्र की बदहाली के पीछे मेडिकल कॉलेज के ही कुछ अधिकारियों का हाथ है। दरअसल कई दवा कंपनियां और स्टोर संचालक अधिकारियों को ब्रांडेड दवा की बिक्री पर कमीशन देते हैं। जन औषधि केंद्र में जेनेरिक दवा बिकने से इनके मुनाफे पर असर पड़ रहा है, जिसके चलते वह किसी भी कीमत पर इस केंद्र को बंद करना चाहते हैं। अधिकारियों के संरक्षण में केंद्र को बंद करने के कई बार प्रयास हो चुके हैं। जिसके चलते दवा न होने के कारण कई बार केंद्र पर ताला भी लग चुका है।
डॉक्टर भी नहीं करते सहयोग
जन औषधि केंद्र को डॉक्टरों का सहयोग भी नहीं मिल पा रहा है। ज्यादातर डॉक्टर मरीजों को जेनेरिक के बजाय ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं। इससे मरीजों को बाजार से ही महंगी कीमत पर दवा खरीदनी पड़ती है। जन औषधि केंद्र पर चिकित्सकों की लिखी दवाएं नहीं मिलती।
जन औषधि केंद्र खुलने पर मरीजों को जेनेरिक दवाएं मिल सकेगी। राजकीय दून मेडिकल कॉलेज टीचिंग अस्पताल स्थित जन औषधि केंद्र का संचालन मेडिकल कॉलेज के अधीन किया जा रहा है। मेडिकल कॉलेज को केंद्र में पर्याप्त दवाओं की व्यवस्था करनी चाहिए।
- डा. वाईएस थपलियाल, सीएमओ