अब दवाएं ग्राहकों का दर्द और बढ़ा सकती हैं। रुपए की वैल्यू घटने से दवाओं के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल की लागत में तकरीबन 15-20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।
ज्यादातर साल्वेंट, कलर्स चीन समेत दूसरे देशों से आयात किए जाते हैं। साल्ट, पीवीसी, कलर, प्रिंटिंग इंक, यूनिट कार्टंस में बढ़ोत्तरी की मार 70 फीसदी फार्मा यूनिट्स झेल रही हैं। ईंधन की लागत बढ़ने, बिजली की खराब स्थिति ने हालत और बिगाड़ दी है।
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होल सेल प्राइस इंडेक्स में बढ़ोत्तरी से रिटेल पर भी दबाव है। अभी तक ड्रग कंट्रोल प्राइस आर्डर के तहत जरूरी दवाओं पर सरकार का नियंत्रण है, लेकिन उत्पादक कंपनी की लागत बढ़ने और होल सेल डीलर्स का मार्जिन कम होने से खुदरा मार्केट पर इसका असर पड़ सकता है।
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अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) बढ़ोत्तरी को लेकर कारोबारी डिपार्टमेंट आफ फार्मास्यूटिकल्स समेत कई मंचों पर दबाव बनाने में जुटे हैं। इनका सीधा कहना है कि नुकसान की स्थिति में यूनिट संचालित करना संभव नहीं हो पाएगा।
10 हजार करोड़ का सालाना कारोबार
उत्तराखंड में ढाई सौ से अधिक फार्मा यूनिट्स हैं। सिडकुल हरिद्वार, भगवानपुर, उधम सिंह नगर, सेलाकुई में स्थित इन इन यूनिट्स का सालाना कारोबार तकरीबन आठ हजार से 10 हजार करोड़ रुपए का है।
देश का 15 फीसदी फार्मा उत्पादन यहां
देश का 15 फीसदी फार्मा उत्पादन उत्तराखंड में होता है। हिमाचल प्रदेश को भी इसमें मिला लिया जाए तो यह उत्पादन तकरीबन 35 फीसदी पहुंचता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो उत्पादकों को राहत मिलनी चाहिए।
आवश्यक दवाओं की कीमतें कंपनी या डीलर तो बढ़ा नहीं सकते। नुकसान की स्थिति में कंपनी उत्पादन में कटौती का फैसला ले सकती है, यह सबके लिए मुश्किल बनेगा।
- नीरज जैन, फार्मा सीएंडएफ डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन देहरादून
कच्चे माल की लागत बढ़ने से फार्मा यूनिट्स की संचालन लागत भी बढ़ गई है। जिनका केंद्रीयकृत उत्पादन नहीं है, वह निश्चित तौर पर इससे परेशान हो रहे हैं।
- प्रवीर ओबराय, फार्मा कारोबारी, सेलाकुई इंडस्ट्रियल एरिया