देहरादून की सुसवा नदी का जहरीला पानी किसानों के लिए मुसीबत बन गया है। नदी के आसपास के इलाकों में इस पानी की वजह से लोगों ने बासमती की खेती बंद कर दी है। किसानों का कहना है कि सुसवा नदी के पानी से सिंचाई करने की वजह से कई को गंभीर चर्म रोग हो गए।
दूधली और इसके आसपास से बहने वाली नदी के पानी में हाई मैग्नीशियम, कैल्शियम और दूसरे हानिकारक कैमिकल होने की खबर अमर उजाला ने 22 फरवरी के अंक में ‘कैंसर, कोमा में न पहुंचा दे सुसवा का पानी’ शीर्षक से प्रकाशित की थी। खबर में बताया गया था कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की पानी की सैंपलिंग में बेहद खतरनाक केमिकल के होने की पुष्टि हुई है।
इस वजह से इस नदी से जुड़े इलाकों में लोगों को बीमारियां हो रही हैं। किसान नारायण सिंह बोरा ने कहा कि नदी का पानी काफी दूषित हो गया है। पशु भी इसका पानी पीते हैं। इस पानी से जो घास उगती है, उसे पशु नहीं खाते। किसान जय सिंह वर्मा ने बताया कि शहर का सीवर वाला पानी सुसवा में आता है।
जब उससे सिंचाई करते हैं तो खुजली हो जाती है। कई किसानों को इस पानी की वजह से चर्म रोग हो चुके हैं। खेती भी खराब हो गई है। पहले बासमती उगाते थे, लेकिन अब वह खुशबू नहीं रही, इसलिए गन्ना उगाते हैं। किसान लाल सिंह ने बताया कि पानी बेहद दूषित होने की वजह से उनकी खेती पर बुरा प्रभाव पड़ा है।
किसान राजू ने बताया कि बचपन में वह इस नदी में से मछली पकड़ते थे, लेकिन अब इसमें मछली नहीं होती है। उन्होंने बताया कि सुसवा साग होता था जोकि अब नहीं होता है। सुसवा साग इस नदी की पहचान था। पानी से बहुत बदबू आती है। किसानों ने मांग की है कि इस नदी में जल्द से जल्द गंदगी का प्रवाह रोका जाए और सुसवा को पुराने रंग में लाया जाए।
आरटीआई कार्यकर्ता अजय कुमार का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण विभाग को नदी में आर्सेनिक और लैड की जांच करनी चाहिए। साथ ही नदी से लगे इलाकों में पेयजल स्त्रोतों के पानी की भी जांच किसी केंद्रीय एजेंसी से होनी चाहिए। हैंडपंपों के पानी में भी हल्की बदबू आती है जोकि लोगों के लिए खतरनाक है। उनका कहना है कि इस नदी का पानी आगे जाकर गंगा में मिल रहा है। अगर ऐसा ही पानी गंगा में मिलेगा तो गंगा कैसे साफ होगी?