उत्तराखंड में यमुनोत्री, कोटद्वार, रानीखेत व डीडीहाट को अब तक जिला न बनाने के मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने कांग्रेस पर तीर तो चलाया, मगर वह निशाने पर बैठता प्रतीत नहीं हो रहा है।
दरअसल, वे जिस आधार पर चार नए जिलों के गठन की मांग उठा रहे हैं, उसे जानकार महज सियासी शिगूफा बता रहे हैं। चार नए जिलों के गठन के लिए मुख्यमंत्री को पौने दो सौ पत्र लिखने के नेता प्रतिपक्ष के दावे को जानकार दिल बहलाने के लिए ख्याल अच्छा है, जैसा जुमला बता रहे हैं।
मुख्यमंत्री से अमर उजाला ने इस बाबत बात की तो वे बोले, नेता प्रतिपक्ष भी जानते है कि शासनादेशों से प्रशासनिक इकाइयां नहीं बनती। वे हमलावर होते हुए कहते हैं कि यह भाजपा का जनता से छलावा है, उसे माफी मांगनी चाहिए। चार नए जिलों के गठन को लेकर सियासी हलचल उस वक्त शुरू हुई जब नेता प्रतिपक्ष का मुख्यमंत्री को लिखा एक पत्र मीडिया के जरिए आम हुआ।
नेता प्रतिपत्र ने एक बार फिर मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग की थी कि भाजपा सरकार में जिन चार जिलों के गठन का शासनादेश हुआ था, उसे तत्काल अमल में लाया जाए। उन्होंने सरकार को चेताया भी कि अगर 15 अगस्त तक इस शासनादेश को पुनर्जीवित न किया तो व्यापक जनांदोलन चलाया जाएगा।
यह भी कहा कि जरूरत पड़ी तो इसके लिए आमरण अनशन भी किया जाएगा। नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट की माने तो इस मामले को लेकर वे मुख्यमंत्री को 178 पत्र (रिमांइडर) भेज चुके हैं। दरअसल, आठ दिसंबर 2011 को तत्कालीन भाजपा सरकार ने प्रदेश में चार नए जिलों के गठन का शासनादेश जारी किया था। इसके तहत गढ़वाल मंडल में यमुनोत्री व कोटद्वार और कुमाऊं मंडल में डीडीहाट व रानीखेत जिलों की स्थापना की जानी थी।
नेता प्रतिपक्ष के इस कदम को मुंह तोड जवाब देने के लिए सोमवार को कांग्रेसी सक्रिय नजर आए। कांग्रेसियों के कहने का लब्बोलुआब यह था कि यह केवल सियासी नौटंकी भर है, क्योंकि नेता प्रतिपक्ष खुद भी जानते हैं कि जिलों का गठन किस प्रक्रिया केतहत किया जाता है। वह इस सच्चाई को भी नकार रहे हैं कि जिलों का गठन शासनादेश से नहीं अधिसूचना से होता है।
कांग्रेसी पलटवार करते हैं कि भाजपा शासनकाल में जब चार नए जिलों यमुनोत्री, कोटद्वार, रानीखेत व डीडीहाट का शासनादेश जारी किया गया तब इन्हें वजूद में क्यों नहीं लाया गया, इस पर भी नेता प्रतिपक्ष के पास कोई बहुत ठोस वजह नहीं है। केवल मुख्यालय तय करने के विवाद में कई महीने गुजर जाने का बहाना कितना तर्कसंगत है यह जानना मुश्किल नहीं है।
वैसे भी यह मामला बड़े बजट से जुड़ा है। एक संपूर्ण जनपद बनाने के लिए लगभग 300 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। केवल डीएम से ही काम नहीं चलता, पचास से ज्यादा जिला स्तरीय अधिकारियों की तैनाती करनी होती है। उनके घर, दफ्तर, गाड़ी इत्यादि का रनिंग खर्च ही बहुत बैठता है।
ऐसे होता है नए जिलों का गठन
भू-राजस्व अधिनियम की धारा-11 में नए मंडल, जिले व तहसीलों का सृजन होता है और इसी धारा के तहत इन्हें समाप्त भी किया जा सकता है। इसके लिए जिन जिलों के भूभाग को काटकर नया जिला बनाया जाता है, उस जिले के कलक्टर का प्रस्ताव, फिर राजस्व परिषद की सिफारिश शासन को जाती है। तब सरकार उस पर निर्णय लेती है।
वैसे भी जिले बनाने की जो शर्त अधिनियम में उल्लिखित है, उनके तहत तो जिला बनाया जाना संभव नहीं है। एक जिला बनाने के लिए 1991 की जनगणना के आधार पर 15 लाख की आबादी, न्यूनतम क्षेत्रफल 5000 वर्ग किमी, न्यूनतम तीन तहसील, दस ब्लॉक, न्यूनतम 12 थाने, न्यूनतम 300 लेखपाल के क्षेत्र होने चाहिए।
अब ये शर्त तो कोई यूपी में ही पूरी नहीं करता, उत्तराखंड में तो कई पुराने जिलों में भी इतना सब नहीं है। लेकिन यदि जिले बनाने है तो अधिनियम में परिर्वतन भी करना होगा।
प्रशासनिक इकाइयां हवा में नहीं जमीन पर बनाई जाती है। जब जिले बनते हैं तो एक निश्चित भू-भाग सीमांकित होता है। सरहदें तय होती है, जिलों के मुख्यालय तय होते हैं और अधिकारियों की तैनाती करनी होती है। और इन सभी कार्यों के लिए अधिसूचना ही वैधानिक आदेश होता है। यह सामान्य कार्य नहीं है, इसमें मात्र शासनादेश जारी कर श्रेय नहीं लिया जा सकता। इस छल के लिए भाजपा जनता से माफी मांगे।
- हरीश रावत, मुख्यमंत्री
पहले शासनादेश होता है, फिर पूरा प्रस्ताव तैयार होने के बाद अधिसूचना जारी होती है। उस समय जिलों के मुख्यालय को लेकर पैदा हुए विवाद को शांत करने में कई महीने लग गए और तब तक विधानसभा चुनाव आ गए। हमारी पार्टी सत्ता में आती तो ये जिले वजूद में आते। लेकिन कांग्रेस ने विधानसभा में प्रस्ताव लाकर जिलों के गठन का प्रस्ताव ही खारिज करा दिया।
- अजय भट्ट, नेता प्रतिपक्ष