उत्तराखंड राजनीति में दिवाकर भट्टए मंत्री प्रसाद नैथानी और शूरवीर सिंह सजवाण को कौन नहीं जानता। सियासी तजुर्बे और कद के हिसाब से ये इतने बड़े नाम हैं कि अलग-अलग चुनावी समर में होते तो मुकाबले का एक अलग कोण बना रहे होते। देवप्रयाग के चुनावी दंगल में ये तीनों महारथी एक साथ एक.दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं।
ये अकेली ऐसी सीट है जहां दो पूर्व और एक कैबिनेट मंत्री की साख दांव पर लगी है। चुनावी समर में भाजपा ने विनोद कंडारी पर दांव लगाया है। तीन-तीन महारथियों के बीच ये नौजवान संघर्ष करता नजर आ रहा है। रघुनाथ की इस नगरी में कंडारी पर भाजपा का वनवास खत्म करने का भी एक मनोवैज्ञानिक दबाव है।
इस सीट पर कुछ मिथक भी चुनौती बने हैं। मंत्री प्रसाद को चुनाव में शिक्षा मंत्रियों की पराजय का मिथक तोड़ना हैं। राज्य की राजनीति में यह धारणा स्थापित हो चुकी है कि चुनाव में क्षेत्र की प्रजा शिक्षा मंत्री को फेल कर देती है और पेयजल मंत्री को पानी पिला देती है। इत्तेफाक से मंत्री प्रसाद इन दोनों महकमों के मंत्री हैं। वह दोनों ही मंत्रालयों के जरिए क्षेत्र में कराये गए काम के भरोसे वोट मांग रहे हैं।
खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहां पेयजल का गंभीर संकट रहा। इसलिए उनके समर्थकों ने गढ़वाली में बाकायदा ये गीत शिलका डांडा पानी पहुंचे, गढा है, जिसे प्रचार वाहन गांव- गांव बजा जा रहा है। वह श्रीकोट माल्डा में एनसीसी अकादमी ए देव प्रयाग में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान और संगम नगरी को कुंभ क्षेत्र में शामिल कराने का श्रेय लेने की कोशिश में जुटे हैं। मगर पूरी ताकत झोंकने के बावजूद चुनाव विकास के मुद्दे पर केंद्रित नहीं हो पा रहा। विरोधी उन्हें बाहरी साबित करने पर आमादा हैं। बाहरी और स्थानीय के इस मुद्दे के निशाने पर मंत्री ही नहीं विनोद कंडारी भी हैं।
दरअसल, परिसीमन से पहले देवप्रयाग सीट नरेन्द्रनगर, रूद्रप्रयाग और घनसाली तक फैली थी। परिसीमन के बाद ये चारों क्षेत्र अलग विधानसभा के रूप में अस्तित्व में आ गए। प्रतिद्वंद्वी मंत्री प्रसाद और कंडारी का मूल गांव घनसाली में बता रहे हैं। खासतौर पर दिवाकर समर्थकों की ओर से ये प्रचार ज्यादा सुनियोजित तरीके से हो रहा है। मगर शूरवीर के समर्थक हरिद्वार में बस चुके दिवाकर को बाहरी साबित करने पर तुले हैं। स्थानीय और बाहरी के इस मुद्दे के बीच चुनावी जंग बेहद दिलचस्प और कांटे की हो गई है।
एक -दूसरे को पछाड़ने के लिए इन तीनों धुरंधरों की चालें खत्म नहीं हो रही। बढियारगढ़ से कीर्तिनगर तक चुनावी हवा में दिवाकर भट्ट की गुलाबी पताकाएं लहरा रही हैं, तो वहीं बनगढ़, पौड़ीखाल और गुर्तीकांठा में शूरवीर का पितांबरी झंडा बुलंद नजर आ रहा। मंत्री प्रसाद का ‘हाथ’ कहीं ज्यादा तो कहीं कम है, मगर सर्वत्र है। इन दिग्गजों के बीच नौजवान विनोद कंडारी मोदी लहर और जिला पंचायत अध्यक्ष बहन सोना सजवाण के बूते चुनाव का रुख भाजपा की ओर मोड़ने की कोशिश में जुटे हैं। उन पर देवप्रयाग सीट पर भाजपा के लिए बने मिथक को तोड़ने का दबाव है।
दरअसल, नब्बे के दशक तक देवप्रयाग भाजपा की पारंपरिक सीट रही। 1991 से 1996 तक मातबर सिंह कंडारी इस सीट पर लगातार भगवा बुलंद करते आए। पिछले 15 साल से भाजपा वनवास से लौटने को बेकरार है और इस बार उम्मीद कंडारी से है। लेकिन कंडारी इस सीट पर जिस अप्रत्याशित ढंग से उतारे गए, उसने असंतोष के हालात पैदा कर दिए। पार्टी के कई नेता ज्ञात-अज्ञात ढंग से दिवाकर का साथ दे रहे हैं।
उत्तराखंड आंदोलन के फील्ड मार्शल कहे जाने वाले दिवाकर और सीट बदल-बदलकर चुनाव जीतने के माहिर शूरवीर सिंह सजवाण के बीच फंसे कंडारी के लिए मंत्री प्रसाद का सियासी हुनर भी कठिन चुनौती बना हुआ है। इस चारों उम्मीदवारों के मध्य मलेथा में स्टोन क्त्रस्शर के खिलाफ सत्याग्रह करने वाले समीर रतूड़ी और यूकेडी के गणेश भट्ट की वोटों के गणित को उलझाने की कोशिशों में जुटे हैं। कुल मिलाकर ये चुनाव मंत्री, भट्ट और सजवाण के राजनीतिक भविष्य की दिशा भी तय करेगा।