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जहरीली शराब कांड ने छीनी 41 लोगों की जिंदगी लेकिन इनके जीवन में लग गया ग्रहण, बेहद दुखद

Fri, 22 Feb 2019 08:24 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal ब्यूरो/अमर उजाला, रुड़की/चुड़ियाला
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सुरेश और मांगे राम - फोटो : अमर उजाला
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यूं तो मानव शरीर में सभी अंगों का महत्व है, लेकिन शारीरिक इंद्रियों में आंखों से न केवल अपने शरीर और अपनों को जी भरकर देख लेने से रुहानी सुकून मिलता है बल्कि दुनिया के दीदार का भी एकमात्र जरिया है।

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मानव शरीर और प्रकृति के इस नायाब जरिए को मौत के सौदागरों द्वारा बांटी कच्ची शराब ने कुछ घंटों में ही छीन लिया। कच्ची शराब के कहर की यह कहानी बिंडुखड़क और बाल्लुपुर गांव के उन दो ग्रामीणों से जुड़ी है, जिनका जहरीली शराब ने संसार ही छीन लिया है। अपनों के दीदार को तरस दोनों लोग रो-रोकर यही कह रहे हैं कि इससे अच्छा तो यह होता कि शराब के सौदागर उन्हें मौत के घाट उतार देते।

कच्ची और जहरीली शराब ने अब तक 41 लोगों की जिंदगी छीन ली है, जबकि दो ग्रामीण ऐसे हैं जिन्हें जीते जी अंधकार में धकेल दिया है। इस भयानक हादसे में इन दो ग्रामीणों की जान तो बच गई है, लेकिन जहरीली शराब ने आंखों की रोशनी छीनकर जिंदगी में जीवन भर के लिए अंधेरा छोड़ दिया है। झबरेड़ा थाना क्षेत्र के बिंडुखड़क निवासी सुरेश पुत्र जयकुमार (45) की आंखों की रोशन खत्म हो चुकी है।

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सुरेश ने बताया कि उसने आठ फरवरी को शराब पी ली थी, सुबह उठने पर वह ठीक महसूस कर रहा था, लेकिन सिर में गैस पैदा होने तथा दर्द होने का अहसास हुआ तो परिजनों ने जबरदस्ती सहारनपुर के एक अस्पताल में भर्ती करा दिया। इसके बाद धीरे-धीरे आंखों की रोशनी गायब होती चली गई। मजदूरी कर परिवार का पेट पाल रहे सुरेश अब पूरी तरह असहाय हैं। भाई सेठपाल ने बताया कि चिकित्सकों का कहना है कि नस ब्लॉक होने के कारण रोशनी लौटने की उम्मीद न के बराबर है।

फिर भी तसल्ली के लिए हरिद्वार के गंगा माता चेरीटेबल हास्पिटल में इलाज करा रहे हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति मांगेराम पुत्र नानू (38) वर्ष निवासी बाल्लुपुर की भी है। मांगेराम ने बताया कि गांव में तेहरवीं के बाद एक रिश्तेदार के साथ शराब पी थी। रिश्तेदार की तबीयत बिगड़ने के बाद उसे भी सहारनपुर भर्ती कराया गया था। दो दिन बाद उसकी रोशनी खत्म होने लगी। पहले आंखें पीली पड़ने लगी और फिर दिखना बंद हो गया।  
 

आवाज सुनाई देती है तो बच्चों को देखने के लिए रोती हैं आंखें 

सुरेश की आंखों की रोशनी चली गई, लेकिन पानी नहीं थमा है। भाई सेठपाल बताते हैं कि जब उसे खाना देते हैं तो रोटी खाई नहीं जाती। उसे पता नहीं होता कि थाली कहां और उसमें रोटी कहां रखी है। बच्चों की आवाज सुनाई देती है तो उन्हें देखने के लिए रोता रहता है।
 
बार-बार कहता है कि कितने भी पैसे लग जाए, लेकिन उसकी आंखों की रोशनी लौटा दो। उसके इस दुख से परिवार के लोगों की आंखें भी रोने लगती है। बच्चे भी अपने पिता का दुख देखकर खुद को संभाल नहीं पा रहे हैं। इस परिवार के दुख को देखकर ग्रामीण का मन भी भारी है। उसकी हालत देखकर ग्रामीण यही कहते नजर आए कि भगवान ऐसा किसी के साथ न हो। 
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अब शादी के जोड़े में बेटी को नहीं देख पाएगा सुरेश  

सुरेश मेहनत मजदूरी कर सालों से बेटी की शादी के लिए रुपये जोड़ रहा था। करीब डेढ़ लाख रुपये जोड़ भी लिए थे। उसके अरमान थे कि अपनी लाड़ली को शादी के जोड़े में धूमधाम से विदा करूंगा। उसकी आंखों में पल रहे सपने को पूरा होने का इंतजार था, लेकिन उसे क्या पता था कि जिस लाड़ली की शादी के लिए वह रुपये जोड़ रहा है, उसे शादी के जोड़े में अपनी आंखों से देख भी नहीं पाएगा। सुरेश के दो लड़के और दो लड़की है। अब सुरेश के भाई ही परिवार की देखभाल करने में जुटे हैं।
 
आने वाली पीढ़ी से कहूंगा कि शराब को हाथ मत लगाना
मांगेराम के घर पहुंचे तो वह बिस्तर में बेजान से पड़ा था। बात की गई तो वह फूट-फूटकर रोने लगा। कहा कि सरकार से मेरी मदद करा दो, मैं बहुत गरीब आदमी हूं। किसी तरह लकड़ी काटकर परिवार का पालन पोषण कर रहा था, लेकिन अब तो रोशनी भी नहीं रही तो काम कैसे करूंगा और बच्चों केे पेट कैसे पालूंगा। अपने आपको पूरी तरह असहाय महसूस कर रहा मांगेराम ने कहा कि मुझे पता होता कि मेरे साथ इतनी बड़ी घटना हो जाएगी तो मैं कभी भी शराब को हाथ नहीं लगाता। उसने कहा कि आने वाली पीढ़ी से भी यही कहूंगा कि कभी भी शराब को हाथ तक न लगाना।
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