कार्यक्रम में इन्होंने किया प्रतिभाग
संवाद कार्यक्रम में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति विपिन सांघी ने वर्चुअल प्रतिभाग किया। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति संजय कुमार मिश्रा, न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी, न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा ने अपने व्याख्यान दिए। राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल, उत्तराखंड बाल संरक्षण अधिकार आयोग की अध्यक्ष डॉ. गीता खन्ना, एडवोकेट जनरल एस. एन बाबुलकर, अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी, डीजीपी अशोक कुमार, रजिस्ट्रार जनरल उत्तराखंड हाईकोर्ट विवेक भारती शर्मा, सचिव महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास एचसी सेमवाल, डीआईजी गढ़वाल केएस नगन्याल, जिलाधिकारी देहरादून सोनिका, एसएसपी दलीप सिंह कुंवर आदि उपस्थित रहे।
समान नागरिक संहिता का तैयार हो रहा ड्राफ्ट: सीएम
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में समान नागरिकता संहिता लागू करने की दिशा में सरकार आगे बढ़ी है। इसके लिए गठित कमेटी की ओर से ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है, जन सुझाव भी लिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सरलीकरण, समाधान, निस्तारण एवं संतुष्टि के मंत्र पर कार्य कर रही है। जन समस्याओं का त्वरित समाधान हो, इसके लिए अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं।
जेजे बोर्ड में किशोर अपराधों से संबंधित 1176 मामले लंबित
कार्यक्रम में न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी ने बताया कि 31 अगस्त 2022 के आंकड़ों के अनुसार, जेजे बोर्ड में 1176 मामले लंबित हैं। इसमें 2010 का एक, 2013 का एक 2018 के 19, 2020 के 162 और 2021 के 346 मामले लंबित हैं। उन्होंने सवाल उठाया क्यों बालकों को न्याय के लिए इतनी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। कहा कि राज्यों की नीति ऐसी होनी चाहिए, ताकि उनका उत्पीड़न न हो सके। उनके बालपन और यौवन का शोषण न हो सके। पिछले दशक में बालकों के यौन हिंसा के मामलों में वृद्धि देखने को मिली।
छोटे मामलों को बंद कर देना चाहिए
न्यायमूर्ति ने कहा कि बालकों के अपराध करने की दिशा में उनके मामलों में छह माह से पूर्व जांच पूरी की जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो छोटे मामलों को बंद कर देना चाहिए, जबकि बड़े मामलों की जांच मजिस्ट्रेट की देखरेख में होनी चाहिए। बालकों के अपराध के मामलों में जांच के समय परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण होती है, लेकिन कई बार देखने में आया है कि परिवीक्षा अधिकारी की ओर से जांच के लिए अपने सहायक को भेज दिया जाता है।
ये भी पढ़ें...Cheetahs: नई जगह और अलग खान-पान लेगा चीतों का इम्तहान, जानिए इनके नामीबिया से पहुंचने में उत्तराखंड की भूमिका
नीतियों और कानून में दोष नहीं
संवाद कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि देश में बालकों की सुरक्षा और उन्हें न्याय दिलाने के लिए तमाम नीतियां और कानून बने हैं। उनमें कोई कमी नहीं है, लेकिन उनका पालन किस तरह से हो रहा है, यह देखने वाली बात है। उत्तराखंड में निराश्रित बालकों के लिए केवल चार ओपन सेंटर बनाए गए हैं, जबकि इनकी संख्या बढ़ाने की जरूरत है, ताकि किसी बच्चे को सड़क पर सोने के लिए मजबूर न होना पड़े।