देवदार और पत्थरों से बनाया जाता है चालदा महाराज का मंदिर
महासू देवता के मंदिर की स्थापत्य शैली को देख लोग आश्चर्यचकित रह जाते है। यह मंदिर अपनी अनूठी हूण स्थापत्य कला के लिए जाने जाते हैं। सबसे पहले हनोल में देवता के प्रकट होने के बाद हूण राजवंश के पंडित मिहिरकुल हूण या हूणा भाट ने मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद महासू महाराज के मंदिरों का निर्माण हूण स्थापत्य शैली में ही किया जाता है। मंदिर में अधिकांश प्रकृति से सीधे तौर पर मिलने वाली निर्माण सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है।
महासू देवता मंदिर स्थापत्य कला का शानदार नमूना है। चालदा महाराज मंदिर समिति दसऊ के अध्यक्ष शूरवीर सिंह चौहान बताते हैं कि मंदिरों के निर्माण में देवदार के पेड़ की लकड़ी और पत्थरों का प्रयोग होता है। देवदार की लकड़ी से बीम (पिलर), बीम छतरी, चौखटों और दरवाजों का निर्माण किया जाता है।
बीम छतरी, चौखट और दरवाजों पर नक्काशी भी उकेरी जाती है मंदिर की दीवारें और छत नियमानुसार पत्थरों से बनाई जाती है। बताया कि इसमें चट्टानों और छापर पत्थर (स्लेट) का प्रयोग होता है। दीवार की चिनाई के लिए उड़द की दाल के मसाले का प्रयोग होता है। इससे दीवार में पत्थरों का जोड़ दशकों तक मजबूत रहता है।
शूरवीर सिंह चौहान ने बताया कि छत पर एक तांबे का कलश के साथ दरवाजों, चौखट और दीवारों पर भी तांबे की पट्टी लगाई जाती है। मंदिर के निर्माण के लिए हिमाचल प्रदेश से विशेष कारीगर बुलाए जाते हैं। बताया कि पूर्व में स्थापित मंदिरों की हूण स्थापत्य शैली को ध्यान में रखकर ही चालदा महाराज के नए मंदिर बनाए जाते हैं।
इस स्थानों पर है मंदिर
हनोल, मैंद्रथ, ठडियार (उत्तरकाशी), दसऊ, पंजरा भंजरा, गबेला, अष्टी, सलगा, मलऊ, उपरौली, टगरी, गणता, थैना, कोटी, लखवाड़, लखवाडृड, लक्स्यार, बिसोई