शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत हुए दाखिलों की जांच के आदेशों का अनुपालन अब चपरासी कर रहे हैं।
वैसे तो यह जांच चार बड़े अधिकारियों को करनी थी लेकिन विभाग की कार्यप्रणाली इतनी लचर है कि यह काम चपरासियों को सौंपा गया है। कई स्कूलों ने दबी जुबान में इसका विरोध किया है। आरटीई के तहत हुए दाखिलों में भारी गड़बड़ी की खबरें अमर उजाला ने सिलसिलेवार प्रकाशित की थी।
मामलों में शिक्षा सचिव डी सैंथिल पांडियन ने 28 अक्तूबर को जांच बैठा दी थी। राजधानी के स्कूलों की जांच के लिए संयुक्त निदेशक माध्यमिक बीएस नेगी, एसएसए के डा. मुकुल कुमार सती और उप निदेशक आनंद भारद्वाज को जांच दी गई थी।
इसमें आदेश थे कि एक महीने के भीतर सभी दाखिलों की जांच करके रिपोर्ट देनी है। लेकिन एक महीने से ऊपर का वक्त बीत जाने पर भी जांच शुरू नहीं हो पाई थी। अमर उजाला ने 18 दिसंबर के अंक में जांच शुरू न होने की खबर प्रकाशित की तो जांच अधिकारियों की नींद तो खुली लेकिन बेहद लचर तरीके से जांच की इतिश्री की जा रही है।
कुछ स्कूलों और शिक्षा विभाग की एक अधिकारी ने बताया कि आरटीई की जांच का यह काम चपरासियों को सौंप दिया गया है। चपरासी स्कूलों पर दबाव बना रहे हैं। उनकी फाइलें मंगाकर रिपोर्ट बनवा रहे हैं। महकमे के आला अफसर के आदेशों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
बाल आयोग को दी गई एक जिले की जांच रिपोर्ट
आरटीई के तहत फर्जी दाखिलों के मामले पर उत्तराखंड राज्य बाल संरक्षण आयोग ने शिक्षा महानिदेशक को जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए थे। शिक्षा महानिदेशक ने जांच के आदेश भी किए थे लेकिन दो बार रिमाइंडर भेजने पर जो कागज बाल आयोग को उपलब्ध कराए गए, वह चिंताजनक हैं।
आरटीआई कार्यकर्ता अजय कुमार की ओर से सूचना मांगी गई तो पता चला कि केवल पौड़ी जिले की आरटीई दाखिलों की रिपोर्ट आई है। रिपोर्ट में भी बेहद हल्के अंदाज में अवगत कराया गया है कि सभी आरटीई के दाखिले सही हैं।