उत्तराखंड की सत्ता संग्राम की लड़ाई में कूदे भाजपा और कांग्रेस के एजेंडे में नशे के खिलाफ मुहिम को जगह नहीं मिल पाई है। यूकेडी को छोड़कर किसी भी राजनीतिक दल ने नशे के काले कारोबार को मुद्दा नहीं बनाया है। जबकि पंजाब की तर्ज पर उत्तराखंड में भी नशे का कारोबार चरम पर है। बीते साल प्रदेश में पौने पांच करोड़ रुपये कीमत के नशीले पदार्थों की बरामदगी भयावह स्थिति का अंदाज लगाने के लिए काफी है।
नेपाल, बिहार, पंजाब और यूपी के तस्करों के लिए उत्तराखंड नशे की आपूर्ति का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। पहाड़ी क्षेत्रों से होने वाली आपूर्ति इससे अलग है।
इससे भी गंभीर बात यह है कि सौदागरों ने ड्रग्स का सेवन करने वाले युवाओं के हाथों में ही नशा बांटने की कमान सौंप दी है। अक्सर वह शिक्षित नौजवान पकड़ में आ रहे हैं, जो नशा करते-करते कब नशा बाजार के एजेंट बन गए, उन्हें पता ही नहीं चल पाया।
बरेली के तीन बड़े नेटवर्क ध्वस्त हुए तो मेडिकल कॉलेज के कई दर्जन छात्रों के नाम सामने आए। मुख्यमंत्री हरीश रावत प्रदेश में बढ़ते नशा कारोबार कई बार चिंता जता चुके हैं। उनके निर्देश पर पुलिस ने कई बड़े अभियान भी चलाए, लेकिन नशा कारोबार के बड़े मगरमच्छ शिकंजे में नहीं आ सके।
उम्मीद थी कि 2017 के चुनाव में युवाओं को नशे से बचाने के लिए बड़ा मुद्दा बनेगा। भाजपा और कांग्रेस ने अपनी चुनावी घोषणा पत्र में इसका उल्लेख नहीं किया है। अलबत्ता उत्तराखंड क्रांति दल ने जरूर नशा मुक्त राज्य के संकल्प को अपने घोषणा पत्र शामिल किया है।