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मिनी सरकार की नहीं पूछ रहा है कोई

Thu, 03 Apr 2014 03:21 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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पंचायत चुनाव तो अभी दूर हैं पर लोक सभा चुनावों में ही पंचायतों क अनदेखी राजनीतिक दलों पर भारी पड़ सकती है।
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नाराज प्रतिनिधि पूछेंग सवाल
पंचायतों की अनदेखी से नाराज प्रतिनिधि अब राजनीतिक दलों से सवाल पूछने का मन भी बना रहे हैं। उत्तराखंड में करीब 66 हजार पंचायत जन प्रतिनिधि हैं। स्थानीय स्तर पर कई प्रतिनिधि अपना प्रभाव भी रखते हैं।

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यही कारण है कि हर बार चुनाव में पंचायतों का अधिकार संपन्न बनाने का दावा करने में कोई कोर कसर नहींछोड़ी जाती। इस बार भी कुछ-कुछ यही नजारा देखने को मिल सकता है।
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हालांकि चुनाव की तस्वीर अभी पूरी तरह से साफ नहीं हुई है पर यह तय है कि राजनीतिक दलों के एजेंडे में इस बार भी पंचायतों के लिए आश्वासनों का अंबार होगा। प्रदेश में अपना पंचायत एक्ट बनाने का इरादा तो 2003 से जताया जा रहा है।

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इसी तरह पंचायतों को 29 विषयों का अधिकार देने का दावा भी किया जाता रहा है। पर इस बार यह अनदेखी भारी भी पड़ सकती है। पंचायत संगठन 2012 के विधानसभा चुनाव में संयुक्त घोषणा पत्र जारी करने में सफल भी रहे थे।

इस बार भी यह कोशिश की जा रही है कि पंचायतों की अपनी स्थिति पर राजनतिक दलों से पूछ लिया जाए कि आखिर चुनव जीतने के बाद पंचायतों को दिया क्या जाएगा।

पंचायतों को जो नहीं मिला
- अपना पंचायत एक्ट।
- पंचायतों को अधिकार, प्रदेश में पंचायतों को कुल 14 विषयों के अधिकार दिए गए। संविधान में 29 विषयों का अधिकार देने का प्रावधान है।

- ग्राम प्रधानों को लोक सूचना अधिकारी का दर्जा दे दिया गया। जबकि राज्य सूचना आयोग भी कई बार यह साफ कर चुका है कि ग्राम प्रधान निर्वाचित प्रतिनिधि हैं और उन्हें लोक सूचना अधिकारी नहीं बनाया जा सकता।

- पंचायतों में कर्मचारियों की कमी-पंचायतों का तंत्र प्रदेश में करीब 35 प्रतिशत अधिकारियों और कर्मचारियों की बदौलत चल रहा है। इस कमी को दूर करने की मांग अर्से से की जा रही है पर यह मामला भी अभी तक अटका हुआ है।

एक तो करेला, दूजा नीम चढ़ा
पंचायतों के सामने चुनौतियां पहले से ही कम नही थी। उस पर पिछले छह माह से चुनाव को लटका कर इस मामले को और अधिक पेचीदा बना दिया गया।

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पहले आपदा के नाम पर पंचायतों के चुनाव टले और अब लोक सभा चुनाव के नाम पर चुनाव टल गए।

हाल यह है कि पंचायतों में प्रशासक अभी तक तय नही हो पाए हैं जबकि प्रशासकों का कार्यकाल 29 मार्च को समाप्त हो गया था। पंचायत विभाग के मुताबिक न्याय से अभी राय नहीं मिल पाई है।

राजनीतिक दलों के पंचायत प्रकोष्ठ तो हैं पर पूछ इनकी कोई नहीं
 यूं हर एक दल ने पंचायत प्रकोष्ठ को गठन किया हुआ है पर पंचायत प्रकोष्ठों की सुध सिर्फ पंचायत चुनाव के दौरान ही ली जाती है। पंचायतों के सम्मेलन कराने की जहमत तक शायद ही यह प्रकोष्ठ उठाते हों।

...आगे भी है परेशानी
-पंचायतों की परेशानी यहीं पर आकर समाप्त नही होती। हाल ही में सरकार ने करीब दो दर्जन नए निकाय बनाए। इनकी अधिसूचना भी जारी कर दी गई। पर ऐसे में प्रभावित होने वाली ग्राम पंचायतों का नए सिरे से परिसीमन नहीं हुआ।
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यह परिसीमन का मुद्दा पंचायत चुनाव में उठ सकता है। जाहिर है कि फिर कोई कोर्ट का दरवाजा खटखटा कर सरकार को परेशान कर सकता है।

पंचायतों के मुद्दों को जल्द ही राजनीतिक दलों के सामने रखा जाएगा। यह सवाल दलगत राजनीति का नही है। पंचायत संगठनों को एकजुट करने की कोशिश भी की जा रही है।
- एसएस नेगी, अध्यक्ष ग्राम प्रधान संगठन
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