महानगर मुंबई में मन बार-बार जड़ों की ओर लौटता है। शायद यही वजह है कि मुंबई में उत्तराखंड कौथिग-2016 में दूरदराज से आए लोगों को प्रीतिमा वत्स की पेंटिग्स में अपने घरों की याद आई, जो उन्होंने पहाड़ शृंखला के तहत बनाई हैं।
दिल्ली की चित्रकार प्रीतिमा वत्स की पेंटिंग प्रदर्शनी मुंबई कौथिग में चल रही है। अपने रिश्तों की खनक को चटख रंगों में उत्तराखंड के उन लोगों ने महसूस किया जो चाहकर भी सालों से पहाड़ नहीं जा पाए हैं।
चाहे वह चिपको आंदोलन की याद हो या पहाड़ की तबाही, हरियाली बचाने की ललक या पहाड़ की सांस्कृतिक को जीवंत रखने की कोशिश, ये सारे रंग प्रीतिमा की कला में खूब खिले हैं।
अपनी कला यात्रा के बारे में वह कहती हैं कि पहाड़ की लगातार यात्राओं ने मुझे वहां की सांस्कृतिक अस्मिता को करीब से महसूस करने का मौका दिया। अब तो पहाड़ घर की तरह लगता है। मैं बताना चाहूंगी कि मेरे लिए पहाड़ का मतलब पत्थर नहीं होता। मेरे लिए पहाड़ का मतलब है जिजीविषा की पूजा।
प्रीतिमा की कला के रंग चटख हैं। वे पहाड़ों की संवेदना को उभारती है। ऐसे समय जब जंगल और गांवों को बचाने के लिए आह्वान हो रहा हो, प्रीतिमा के ये चित्र उसी लौ को फिर से जगाते प्रतीत होते हैं। इसमें उन वृक्षों की मूक संवाद है। जिन वृक्षों की रक्षा के लिए गौरा देवी और उनकी साथियों ने दुनिया को झकझोरा था।
प्रकृति और इंसान के रिश्ते को महसूस कराते ये चित्र सबका ध्यान खींचते हैं। कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों में हिस्सेदारी कर चुकी प्रीतिमा वत्स इन दिनों पहाड़ के लोकगीत और लोक संगीत पर चित्रों की एक प्रदर्शनी आयोजित करने में भी लगी हैं।
कौथिग मुंबई-2016 के बाद देहरादून में इस प्रदर्शनी का आयोजन होगा। फिलहाल मुंबई में उनकी कला के रंग चहक रहे हैं। मेले में आए लोगों को वे रंग अपने से लगते हैं। कई लोगों ने प्रीतिमा वत्स की पेंटिग के बहाने चिपको आंदोलन को जानने में रुझान दिखाया।