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उत्तराखंड के वीरान पड़े घरों में लौटी पर्यटकों की बहार

Tue, 17 Jan 2017 01:16 PM IST
विनोद मुसान / अमर उजाला, देहरादून
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pahadi house - फोटो : amar ujala
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उत्तराखंड के पहाड़ में खंडहर होते घरों के फिर आबाद होने की उम्मीद जगी है। रोजी-रोटी के लिए लोग जिन घरों को छोड़कर बाहर निकले, वीरान पड़ चुके वही घर अब किसी के लिए रोजगार का जरिया बन रहे हैं।
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पौड़ी जिले के नीलकंठ के अभय शर्मा और टिहरी के अखोड़ी गांव के यश भंडारी ने ऐसी ही मिसाल पेश की है। इन्होंने खंडहर हो चुके घरों को ‘पहाड़ी हाउस’ में तब्दील कर नई पहचान दी है, साथ ही भविष्य के लिए रोजगार की उम्मीद भी जगाई है।

दोनों युवा इससे पहले राफ्टिंग-कैंपिंग व्यवसाय से जड़े थे। लेकिन 2013 की आपदा ने पौड़ी के घट्टूघाट स्थित इनके 20 कॉटेज के रिजार्ट को तहस-नहस कर दिया। इसके बाद भी इन्होंने हार नहीं मानी और कुछ नया करने की ठानी।
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2015 में गांव में खाली पड़े घरों को पर्यटन से जोड़ने की कवायद शुरू की और इसे नाम दिया ‘पहाड़ी हाउस’। इसके तहत इन्होंने टिहरी गढ़वाल के काणाताल और चौपड़ियाल गांव (मसूरी-चंबा रोड) में खंडहर पड़े दो घरों को लीज पर लिया। फिर इन घरों को अपने तरीके से सजाया और संवारा।

पहाड़ी शैली में किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं

pahadi house - फोटो : amar ujala
खास बात यह थी कि इनमें पहाड़ी शैली में किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई। अब यहां आने वाले पर्यटकों की तादाद लगातार बढ़ रही है। जिसमें विदेशी सैलानी भी शामिल हैं। यहां ठहरने वाले पर्यटकों को आसपास के गांवों में भ्रमण के अलावा रसोईघर में खुद अपनी पसंद का खाना बनाने की सुविधा भी दी जाती है।

इसके अलावा पहाड़ी हाउस के बगीचों में फूल और सब्जियां भी उगाई जाती हैं। जिनका प्रयोग यहीं की रसोई में किया जाता है। कुल मिलाकर पर्यटकों को कुछ आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ पहाड़ के ग्रामीण परिवेश से रूबरू कराया जाता है। पहाड़ी हाउस को हकीकत में बदलने वाले दोनों युवाओं की अनूठी पहल की पर्यटन मंत्री और मुख्यमंत्री भी कई मौकों पर प्रशंसा कर चुके हैं।

ग्रामीणों को भी मिला रोजगार 
अभय और यश की इस पहल का लाभ आसपास के ग्रामीणों को भी मिल रहा है। पुराने घरों को ये युवा दस साल की लीज पर लेते हैं। इससे मकान मालिक को भी प्रतिवर्ष करीब एक लाख रुपये किराये के रूप में मिल जाते हैं।

इसके अलावा यहां आने वाले पर्यटकों को पूरी तरह से पहाड़ी व्यंजन परोसे जाते हैं। जिसमें गहत की दाल, झंगोरे की खीर, भट्ट का राबडू, कौदे की रोटी, चौंसा, चुटक्वाणी, काफली, झौली आदि शामिल हैं। यह सभी उत्पाद आसपास के ग्रामीणों से ही खरीदे जाते हैं। ऐसे में इनकी भी अच्छी आमदनी हो जाती है।
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रिवर्स माइग्रेशन की जगी उम्मीद

abhaya, yash - फोटो : amar ujala
पहाड़ी हाउस को धरातलीय हकीकत में बदलने वाले युवा अभय शर्मा का कहना है कि यदि सरकारें सहयोग करें तो ‘पहाड़ी हाउस’ के मॉडल को बड़े पैमाने पर प्रदेश में विकसित किया जा सकता है।

इसके जरिये न सिर्फ पलायन रुकेगा बल्कि रिवर्स माइग्रेशन की दिशा में भी आगे बढ़ा जा सकता है। बकौल अभय, अब हम चंबा के बाद मसूरी के हाथीपांव और पौड़ी के कुनाउ गांव में पहाड़ी हाउस का विस्तार करने जा रहे हैं।

होम स्टे प्रोजेक्ट प्रतियोगिता में पाया स्थान
आउटलुक ग्रुप की ‘होमस्टे प्रोजेक्ट’ प्रतियोगिता में यश और अभय के पहाड़ी हाउस कांसेप्ट को देशभर में पांचवां स्थान मिला है। 19 जनवरी के दिल्ली में आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम में फाइनल रिजल्ट जारी किया जाएगा।

यश और अभय को उम्मीद है कि उनका यह कांसेप्ट पहले या दूसरे स्थान पर भी जगह बना सकता है। गौरतलब है कि आउटलुक ग्रुप की ओर से होटल और ट्रैवल्स के क्षेत्र में विभिन्न कैटेगरी में ये प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। कम्युनिटी होमस्टे प्रतियोगिता भी इन्हीं में से एक है।
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