प्रो. वल्दिया से जुड़ा एक वाकया बहुत चर्चित है कि जब वे पहली बार प्रवक्ता पद का साक्षात्कार देने विवि गए तो उनसे पूछा गया कि वे तो ठीक से सुन नहीं पाते शिक्षण कार्य कैसे करेंगे तो उन्होंने कहा कि वैसे ही जैसे मैंने शिक्षा ग्रहण की और वैसे भी मुझे सुनने से ज्यादा दुनिया को अपनी बात सुनानी है। उनकी यह बात हकीकत भी हुई और जब उन्होंने सुनाना शुरू किया तो जमाना मंत्रमुग्ध होकर बस सुनता ही रहा।
प्रो. वल्दिया के पहले शोध विद्यार्थी प्रो. चारु पंत बताते हैं कि वे सदैव बहुत ही सादगी पसंद और जमीन से जुड़े व्यक्ति रहे। लडडू और जलेबी उन्हें विशेष प्रिय थे और अध्ययन के सिलसिले में ग्रामीण क्षेत्रों में लंबी यात्राओं के दौरान वे किसी भी ग्रामीण के घर में सहजता से ठहरते और भोजन करते थे।
उनकी सादगी की मिसाल यह भी रही कि कुमाऊं विश्वविद्यालय में 1981 और पुन: 1992 में कुलपति रहे पर कभी भी कुलपति की कुर्सी पर नहीं बैठे, बल्कि इसके बगल में एक साधारण कुर्सी लगाकर बैठते थे। प्रो. अजय रावत बताते हैं कि जब किसी मीटिंग में विषय से हटकर बात होने लगती थी तो वे अपनी सुनने की मशीन उतारकर मेज पर रख देते थे जो वक्ताओं के लिए संकेत होता था कि वे फालतू बातों में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहते।