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स्मृति शेष: घोर गरीबी और सुनने में अक्षमता के बावजूद पद्श्री वल्दिया ने दुनियाभर में बनाई पहचान

Wed, 30 Sep 2020 02:25 AM IST
अलका त्यागी गिरीश रंजन तिवारी, अमर उजाला, नैनीताल

सार

  • कहते थे मैं सुनने से ज्यादा विश्व को सुनाना चाहता हूं
  • कुलपति रहे पर कुलपति की कुर्सी पर नहीं बैठे कभी
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पद्मश्री खड़क सिंह वल्दिया - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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पद्मश्री प्रो. खड़क सिंह वल्दिया का बचपन म्यांमार, तत्कालीन बर्मा में बीता था। ये नन्हें बालक ही थे तभी विश्व युद्ध के दौरान एक बम के धमाके से इनकी श्रवण शक्ति लगभग समाप्त हो गई। इनके दादाजी पोस्ट ऑफिस में चतुर्थ श्रेणी कर्मी थे और पिताजी मामूली ठेकेदारी करते थे। परिवार में घोर गरीबी थी।

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माध्यमिक शिक्षा से पहले ही कान खराब होने पर लोग इनका मजाक बनाने से भी नहीं चूकते थे और ताने मारते थे कि यह बच्चा जीवन में कुछ नहीं कर पाएगा। पर अपने मनोबल, संकल्प और कठोर परिश्रम के बूते दुनिया ने आगे चलकर इस बालक की चमक भी देखी और समूचे देश ने उनकी बातें भी गंभीरता से सुनी।

उस दौर में हियरिंग ऐड मशीन की आज जैसी सुविधा नहीं थी। तब बालक रहे वल्दिया सदैव हाथ में एक बड़ी बैटरी लिए चलते थे जिससे जुड़े यंत्र से वे थोड़ा बहुत सुन पाते थे। इसी हालात में उन्होंने न केवल अपनी शिक्षा पूरी की बल्कि टॉपर भी रहे।
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उच्च शिक्षा के लिए जब वे लखनऊ गए तो घोर आर्थिक संकटों के कारण पिथौरागढ़ से टनकपुर तक आना-जाना पैदल ही करते थे। इतने विपरीत हालात में शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद वे कुमाऊं की उच्च शिक्षा की संस्था कुमाऊं विवि के कुलपति और वाडिया इंस्टीट्यूट, देहरादून जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के अध्यक्ष पद तक पहुंचने में सफल रहे। 

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साक्षात्कार के दौरान का वाकया हुआ था चर्चित

प्रो. वल्दिया से जुड़ा एक वाकया बहुत चर्चित है कि जब वे पहली बार प्रवक्ता पद का साक्षात्कार देने विवि गए तो उनसे पूछा गया कि वे तो ठीक से सुन नहीं पाते शिक्षण कार्य कैसे करेंगे तो उन्होंने कहा कि वैसे ही जैसे मैंने शिक्षा ग्रहण की और वैसे भी मुझे सुनने से ज्यादा दुनिया को अपनी बात सुनानी है। उनकी यह बात हकीकत भी हुई और जब उन्होंने सुनाना शुरू किया तो जमाना मंत्रमुग्ध होकर बस सुनता ही रहा। 

प्रो. वल्दिया के पहले शोध विद्यार्थी प्रो. चारु पंत बताते हैं कि वे सदैव बहुत ही सादगी पसंद और जमीन से जुड़े व्यक्ति रहे। लडडू और जलेबी उन्हें विशेष प्रिय थे और अध्ययन के सिलसिले में ग्रामीण क्षेत्रों में लंबी यात्राओं के दौरान वे किसी भी ग्रामीण के घर में सहजता से ठहरते और भोजन करते थे।

उनकी सादगी की मिसाल यह भी रही कि कुमाऊं विश्वविद्यालय में 1981 और पुन: 1992 में कुलपति रहे पर कभी भी कुलपति की कुर्सी पर नहीं बैठे, बल्कि इसके बगल में एक साधारण कुर्सी लगाकर बैठते थे। प्रो. अजय रावत बताते हैं कि जब किसी मीटिंग में विषय से हटकर बात होने लगती थी तो वे अपनी सुनने की मशीन उतारकर मेज पर रख देते थे जो वक्ताओं के लिए संकेत होता था कि वे फालतू बातों में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहते।
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