वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य, उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री और बाद में राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे। उन्होंने लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में अपनी सेवाएं दीं। जहां उन्होंने वन रैंक वन पेंशन और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अहम सिफारिशें कीं। ऊर्जा मंत्री के रूप में ऐतिहासिक टिहरी हाइड्रो परियोजना को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही।
इसके अलावा, उन्होंने महाराष्ट्र के राज्यपाल और गोवा के राज्यपाल के अतिरिक्त प्रभार के रूप में भी प्रशासनिक दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया। राजनीति और समाज सेवा के साथ-साथ लेखन में रुचि रखने वाले भगत दा ने उत्तराखंड के विकास पर दो पुस्तकें उत्तरांचल प्रदेश क्यों और उत्तरांचल प्रदेश : संघर्ष एवं समाधान भी लिखी हैं।