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जैविक खेती से वीराने में खिलाया चमन

Sun, 08 Mar 2015 05:00 PM IST
चंद्रशेखर जोशी/ अमर उजाला, चंपावत
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उत्तराखंड में पहाड़ के लोग जहां की खेती छोड़कर पलायन कर रहे हैं, वहीं ब्रितानी मूल की मीना बर्कबेक ने मेहनत और हौसले की बदौलत जैविक खेती के जरिए नई ऊंचाई हासिल की है।
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करीब तीन लाख रुपए सालाना कमाई
उन्होंने हरित और श्वेत क्रांति का ऐसा समागम किया कि आज वह न सिर्फ अनाज, फल और सब्जियां उगा रही हैं, बल्कि दुग्ध उत्पादों से ही करीब तीन लाख रुपए सालाना कमा लेती हैं।

चंपावत से करीब 10 किमी दूर छीड़ापानी गांव जाने के लिए अच्छी सड़क नहीं है, लेकिन ऐसी वीरान जगह में भी मीना बर्कबेक ने करीब 150 नाली जमीन को हराभरा किया। आलू, प्याज, गोभी, लहसुन, सरसों, मसूर और मक्का से लेकर चारे के लिए चरी तक से जमीन को लहलहाया।
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जैविक तरीके से उगाई गई साग-सब्जी से वह सालाना करीब एक लाख रुपए कमा लेती हैं। इसके अलावा, उन्होंने सात गायें भी पाल रखी हैं, जो रोजाना लगभग 30 लीटर दूध देती हैं। दूध की सही कीमत नहीं मिलने पर पनीर और अन्य प्रोडक्ट बनाकर बेच रही हैं।

इस तरह दुग्ध उत्पादों से वह सालाना करीब 3 लाख रुपए कमा लेती हैं। बर्कबेक बताती हैं कि मां जूलियट और पिता पीटर बर्कबेक की सीख के अलावा भाई डेसमंड के प्रोत्साहन ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया। वह तीन दशक से खेतीबाड़ी कर रही हैं।

कृषक पुरस्कार से सम्मानित
मीना बर्कबेक की खेत-खलिहान में की गई साधना को सरकार ने भी सराहा। 2011 में उन्हें राज्य के सर्वश्रेष्ठ कृषक रत्न का पुरस्कार मिला। पुरस्कार में उन्हें 50 हजार रुपए दिए गए। 2012 में पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय ने उन्हें प्रगतिशील कृषक सम्मान दिया गया।

150 साल पूर्व इंग्लैंड से आए थे पूर्वज
मीना बर्कबेक के पूर्वज यहां इंग्लैंड से करीब 150 साल पूर्व यहां बसे। मीना के छोटे भाई और चाय बोर्ड में प्रबंधक डेस्मंड बताते हैं कि यहां करीब तीन पीढ़ी से चंपावत में है। उनके दादा डोनाल्ड ब्रेकबेक और नाना जेम्स बेस्टिक मूलत: ब्रिटिश थे।
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