देहरादून समेत आसपास के इलाकों में शुक्रवार देर रात तक रुक-रुककर बारिश होती रही। बावजूद इसके शहर के अधिकतम तापमान में करीब तीन डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की गई। सुबह करीब दो घंटे तक रिमझिम बारिश हुई।
मौसम विभाग के अनुसार मोहकमपुर केंद्र में पूरे दिन 29 और आशारोड़ी में 42 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई। रात का न्यूनतम तापमान 24.1 डिग्री दर्ज किया गया। मौसम केंद्र निदेशक बिक्रम सिंह ने बताया कि आज भी दून समेत आसपास के इलाकों में बादल छाए रहेंगे।
सुबह हरिद्वार में हल्की बारिश होने से मौसम सुहावना हो गया जिससे कांवड़ियों को गर्मी से राहत मिली। रुड़की और मंगलौर में कई हिस्सों में बारिश के बाद कई जगह जलभराव होने से लोगों को परेशानी उठानी पड़ी।
नगर के मोहल्ला टोली में विभिन्न सड़कें पानी से लबालब हो गई। पानी की निकासी की व्यवस्था नहीं होने की वजह से थाने वाली रोड पर भी जलभराव हो गया। नगर के रखरखाव की जिम्मेदार नगर पालिका के सामने भी जलभराव हुआ। मोहल्ला लाल बड़ा में डिग्री कॉलेज रोड पर भी जलभराव होने से लोगों को निकलने में दिक्कत हुई।
रुद्रप्रयाग जिले में बरसात के कारण जनपद में सात संपर्क मोटर मार्ग अब भी बंद पड़े हैं। जिस कारण संबंधित क्षेत्र के ग्रामीणों को मीलों पैदल चलना पड़ रहा है। साथ ही बाजारों में जरूरी सामग्री भी नहीं पहुंच पा रही है। लोनिवि कार्यालय से बताया गया कि बरसात के कारण ग्वाड़-खेड़ीखाल-पाबौ, सिंराई-भटवाड़ी-नंदवाणगांव, ममणी-जखोली, कोटखाल-जगतोली, सणगू-सारी, घेंघडख़ाल-जवाड़ी और तिलवाड़ा-सौंराखाल मोटर मार्ग बंद पड़े हैं।
दूसरी तरफ जखोली ब्लॉक में मयाली-पांजणा मोटर मार्ग पर राजकीय इंटर कालेज जयंती-कोठियाड़ा के समीप स्क्रपर क्षतिग्रस्त हो गया, जिससे स्कूली बच्चों व स्थानीय लोगों को आवाजाही में खतरा बना हुआ है। ग्रामीणों ने लोनिवि से यथाशीघ्र स्क्रपर की मरम्मत की मांग की है।
केदारपुरी में घना कोहरा, दिनभर होती रही बारिश
शुक्रवार दोपहर बाद से रुद्रप्रयाग समेत जनपद के अन्य इलाकों में रुक-रुककर तेज बारिश होती रही। उधर, केदारनाथ में भी मौसम का मिजाज बिगड़ा रहा। यहां दिनभर कई बार हल्की बारिश हुई। केदारपुरी में घना कोहरा छा गया। शुक्रवार को सुबह से आसमान में घने बादल छाए रहे। इस दौरान कई बार बूंदाबांदी भी हुई। दोपहर ढाई बजे से तेज बारिश शुरू हो गई, जो रुक-रुककर देर शाम तक होती रही। उधर, केदारनाथ में भी सुबह से शाम तक कई बार हल्की बारिश हुई। जिला आपदा कंट्रोल रूम से बताया गया कि यात्रा सुचारू चल रही है।
पूरे हिमालयी क्षेत्र पर ही मौसम के बदलते तेवर की मार है। मौसम के बदलते तेवर पर निगाह रख रहीं एजेंसियों की ओर से तैयार किए गए असुरक्षा के सूचकांक से यह जाहिर भी हो रहा है। यह सूचकांक बताता है कि मौसम बदलाव के कारण हिमालयी राज्यों में असम सबसे अधिक प्रभावित है और सिक्किम सबसे कम। उत्तराखंड इस श्रेणी में नीचे के पायदान पर है, लेकिन यहां भी मौसम बदलाव के कारण जन जीवन खासा प्रभावित हो रहा है।
हिमालय में जलवायु परिवर्तन के कारण मानव जीवन से संबंधित करीब-करीब हर क्षेत्र प्रभावित है। आपदाओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है और इस कारण अब हर साल प्रभावित होने और असुरक्षा में जीने को विवश लोगाें की संख्या में इजाफा हो रहा है। जम्मू कश्मीर से लेकर उत्तराखंड सहित उत्तर पूर्व के राज्यों की इस हिसाब से कहानी एक जैसी ही है। यही वजह भी है कि मसूरी में 28 जुलाई को एक मंच पर आ रहे 11 हिमालयी राज्यों के विमर्श का यह मुख्य बिंदु भी है। मेजबान उत्तराखंड की ओर से तैयार की गई रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए समान कार्ययोजना पर भी जोर दिया गया है।
हिमालयी राज्यों के सामने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक संसाधनों की भी है। आपदा प्रबंधन तंत्र को मजबूत करने से लेकर असुरक्षित समुदायों के विस्थापन तक के लिए इन्हें पैसा चाहिए। राज्य अपने बल पर इस काम को अंजाम देने में सक्षम नहीं पा रहे हैं। हिमालयन कॉन्क्लेव में इस मुद्दे पर भी बात करने की तैयारी की गई है।
मद पैसे की दरकार (लाख रुपये में)
वन एवं जैव विविधता 97101
ऊर्जा 15838
आपदा प्रबंधन 37125
जल संसाधन 9825
कृषि 7991
स्वास्थ्य 10400
उद्योग 4260
पशुधन 19274
सड़क 623000
पर्यटन 4100
परिवहन 12880
शहरी विकास 41465
1. हिमालयी क्षेत्र में औसत तापमान अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ रहा है। हाल यह है कि पर्वतीय क्षेत्रों में भी लोगों को पंखों और कूलरों का सहारा लेना पड़ रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने की दर भी प्रभावित हो रही है और इसका सीधा प्रभाव हिमालयी नदियों में जल की मात्रा पर पड़ रहा है।
2. कृषि सबसे अधिक प्रभावित हो रही है। अधिकतर हिमालयी राज्यों में खेती वर्षा आधारित है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में 87 प्रतिशत खेती इसी तरह की है। यह पाया गया है कि अधिकतम बारिश का समय करीब 15 दिन पीछे खिसक गया है। इससे फसल चक्र प्रभावित हो गया है।
3. आपदाओं की बाढ़: अतिवृष्टि, बादल फटने, लंबे समय तक सूखा, अचानक नदी नालों का उफना जाना, हिमस्खलन आदि प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है।
4. विकास योजनाओं की लागत लगातार बढ़ रही है। सड़क, पुल जैसी लंबे समय में तैयार होने वाली योजनाओं पर सरकार को अधिक खर्च करना पड़ रहा है।
5. भू-क्षरण बढ़ गया है। बारिश की मात्रा में कमी नहीं आई है लेकिन पहले एक माह में होने वाली बारिश एक ही दिन में हो रही है। इससे मिट्टी की ऊपरी सतह प्रभावित हो रही है। इसका प्रभाव जंगल की सेहत पर भी है।
6. कई सालों की बसावट वाले क्षेत्र अब असुरक्षित हो गए हैं। आपदा प्रबंधन के अध्ययन के मुताबिक प्रदेश में नदी नालों के किनारे की करीब 350 बसावटें इस तरह के खतरे की जद में हैं।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का लगातार अध्ययन किया जा रहा है। राज्य ने एक्शन प्लान भी तैयार कर लिया है और संबंधित विभाग अपने स्तर पर एक्शन प्लान के हिसाब से काम करना शुरू कर चुके हैं। - आरएन झा, अपर प्रमुख वन संरक्षक, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन