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एक साल बाद भी रिस रहे हैं केदारघाटी के जख्म

Mon, 16 Jun 2014 02:00 PM IST
सुधाकर भट्ट, अनूप वाजपेयी/ अमर उजाला, देहरादून
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आपदा के एक साल बाद चौमासी से केदारनाथ तक का वैकल्पिक मार्ग तो खैर नहीं ही बना। पिछले आठ साल से लड़ रहे केदारघाटी के सीमांत गांव चौमासी के लोगों का एक किलोमीटर सड़क तक नसीब नहीं हुई।
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यही चौमासी थी जिसने जून 2013 की आपदा में केदारनाथ से भटक कर पहुंचे करीब चार हजार तीर्थयात्रियों को रहने और खाने को दिया था।

यही चौमासी है जिसने आपदा में 12 परिवारों की रोजी रोटी का सहारा खोया था। मृतक आश्रितों को चैक तो मिल गए पर गांव एक साल बाद और बुरी दशा में हैं।

चौमासी की तरह ही पूरी केदारघाटी में जून 2013 की आपदा के जख्म आज भी रिस रहे हैं। सरकार ने इन जख्मों पर मुआवजे का मरहम लगाया और बाकी सब कुछ वैसे ही रहने दिया।

चौमासी का एक साल का सफर बता रहा है कि राहत के नाम पर सरकार ने एक साल मे क्या किया। नदी के कटाव से पीड़ित गांव आज भी हर बरसात में अपने घरों को छोड़कर जंगल में बनाई झोपड़ियों में शरण ले रहा है।
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गांव के नीचे जो तटबंद बनाए जाने थे वे आचार संहिता की भेंट चढ़ गए। गांव में उरेडा की घराट परियोजनाओं से बिजली मिलती थी। एक साल बाद उन उन घराटों का मुआवजा दे दिया गया पर घराट अभी तक नहीं बने।

गांव में अंधेरा सोलर लालटेन के सहारे दूर हो रहा है।

चौमासी को कुछ नहीं मिला

कुछ समय पहले ही मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा था कि चौमासी से केदारनाथ तक का वैकल्पिक मार्ग बनाया जाएगा।

यह वही मार्ग है जिससे जून 2013 की आपदा के मारे बच कर निकल पाए थे। जून माह में भूल भटक कर गावं पहुंचने वाले लोगों को खाना खिलाया गया था, रहने को जगह दी गई थी, उन्हें गुप्तकाशी पहुंचने का रास्ता दिखाया गया था।

पर बदले में चौमासी को क्या मिला। चौमासी तक का सड़क मार्ग किसी तरह से बन पाया। अपने रिस्क पर इस सड़क मार्ग पर जीप वाले सवारियों को लाते-ले जाते हैं।

भू स्खलन के डर से आधा चौमासी मूल गांव से हट कर एक किलोमीटर दूर निफ्तर तक पहुंच चुका है। पर पिछले आठ साल की लड़ाई के बाद भी चौमासी को यह किलोमीटर सड़क नहीं मिली।

सड़क के नाम पर 18 लाख रुपए का बजट मुआवजे और रोड कटिंग के लिए स्वीकृत है पर इस पैसे का कोई उपयोग नही हुआ। चौमासी ने अपने लिए सिर्फ कुछ प्री फेब्रीकेटिड टिन शेड मांगे थे।

इनका कहना था कि बरसात में गांव की जमीन पर ही अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में रहने केलिए जगह भर मिल जाए तो काम चल जाएगा। पर सरकार से एक साल में यह भी नहीं हुआ।

कारण केदारनाथ वन्य विहार से घिरे इस गांव के लिए वन कानून आड़े आ रहे हैं। यह हाल सिर्फ चौमासी के नहीं है। केदारघाटी के अधिकतर गांवों के यह हाल हैं।

पर एक साल बाद भी ये वहीं खड़े हैं। मृतक आश्रितों को पांच-पांच लाख के चैक मिल गए पर इनके जख्म अब भी हरे ही हैं। केदारघाटी में आपदा आकर गुजर गई पर जख्म अब भी रिस रहे हैं।

1750 रुपए के तो जूते-चप्पल घिस गये

इस एक साल में क्या मिला। दो खेत बह गए थे। उसका 1750 रुपए मुआवजा मिला। जून 2013 में करीब चार हजार लोग केदारनाथ से बचकर गांव की तरफ आये थे।

इन लोगों को गांव वालों ने शरण दी। रहने और खाने का इंतजाम किया। गांव का मुखिया होने के नाते मेरी ज्यादा जिम्मेदारी थी। 1750 रुपए से ज्यादा तो खाना खिलाने में ही खर्च हो गए होंगे।

जितना मुआवजा मिला उससे ज्यादा के तो जूते-चप्पल ही घिस गए, निफ्तर के लिए एक किलोमीटर की सड़क को बनाने की कोशिश में।

अब मेरी पत्नि पंचायत चुनाव लड़ रही है। जीत गई तो एक बार फिर से कोशिश शुरू होगी। पर न सड़क मिली, न बिजली है, न घर मिला।

इस एक साल में मिला क्या। सिर्फ इस बार की बरसात की चिंता। इस चिंता को ही दूर कर देते तो थोड़ा चैन तो मिलता।
- सुरेंद्र सिंह लिंदौली, निवर्तमान ग्राम प्रधान चौमासी

कांसेप्ट पेपर दिया था पर कोई रिस्पांस नहीं

आपदा से निपटने के लिए अलग से एक ऐसा संस्थान बनाया जाना चाहिए जिसका मैनडेट ही यह हो कि वह आपदा से संबंधित पहलुओं पर काम करें और शोध से लेकर क्रियान्वयन तक के लिए जवाबदेह हो।

हो यह रहा है कि अलग-अलग संस्‍थानों का मेनडेट अलग-अलग है। मसलन नदियों के बाढ़ क्षेत्र का ही सीमांकन करना है। मालम पड़ा कि जिस संस्थान को आपने यह करने के लिए कहा उसकी प्राथमिकता में यह हो ही नहीं।

उस संस्थान के उच्चाधिकारी भी अपने काम को लेकर संजीदा होंगे और वे उस काम को पहले करना चाहेंगे जिसका उन्हें जिम्मा सौंपा गया है। ऐसे में आपदा का काम अधर में लटक कर रह जाता है।

हमने सरकार को एक कांसेप्ट पेपर भी दिया था। इस पेपर में हमने पूरा खाका सरकार केसामने रखा था। इसके अलाव भी सरकार को पत्र लिखे गए पर कोई जवाब नहीं मिला।

पर ऐसा नहीं है कि कहीं कुछ हो ही नहीं रहा है। लगातार कोशिश की जा रही है। इन कोशिशों को स्ट्रीमलाइन करने की भी जरूरत है। हमने सरकार से यह भी कहा था कि पहाड़ों में भूस्खलन क्षेत्रों की निरंतर मानिटरिंग होनी चाहिए।

एअरबोर्न सर्वे की जरूरत है। खतरनाक रास्तों का वैकल्पिक मार्ग तैयार होना चाहिए।
- डॉ. विजय डिमरी, पूर्व निदेशक, नेशनल जियोफिजीकल रिसर्च इंस्टीट्यूट

हरे हैं आपदा के दिये जख्म

चार धाम यात्रा केलिए जर्जर हो चुकी सड़कों पर तारकोल बिछाकर ब्लैक टॉप करकेअपनी पीठ थपथपा रही सरकार उस एक भी जख्म को नहीं भर पाई जो जून 2013 की आपदा ने दिए थे।

ये जख्म आज भी रिस रहे हैं। सेमी गांव में मकान धंस रहे हैं। गुप्तकाशी से आगे निकलते ही यह जख्म दिखने शुरू हो जाते हैं। सोनप्रयाग से पैदल यात्रा हो रही है।

गौरीकुंड में हल्की चहल पहल है पर बाढ़ से टूटे मकान हवा में वैसे ही झूल रहे हैं जैसे एक साल पहले थे। रामबाड़ा में 15 जून को घोल्डया संग्रांद थी। इस दिन आसपास के सब व्यापारी, घोड़े खच्चर पालकी वाले सब यहां मोजूद थे।

साल भर का हिसाब किताब हुआ था। पर 16 जून की शाम और 17 जून की सुबह को आई प्रलय ने रामबाड़ा का नामोनिशांन ही मिटा दिया। न रामबाड़ा बचा और न लोगों की साल भर की कमाई।

साल भर बाद भी रामबाड़ा में मंदाकिनी का शोर, आपदा की भयावहता पसरी पड़ी है। हालांकि मुख्यमंत्री हरीश रावत कह रहे हैं कि रामबाड़ा को फिर से बसाएंगे। पर कब?

दिल्ली और यूपी में नहीं दिला पाए सभी को मुआवजा

आपदा में मारे गए लोगों के आश्रितों को मुआवजा राशि और मृत्युप्रमाण पत्र जारी करने का काम लगभग पूरा हो गया है।

जबकि उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैस राज्यों की वजह से सैकड़ों लोगों का मामला एक साल बाद भी अटका है। मृत्यु (लापता भी शामिल) का सरकारी आंकड़ा 4025 है।

इनमें से करीब साढ़े चार सौ लोगों का मामला अभी संबंधित राज्य सरकारों की वजह से उलझा है। जिसमें 265 उत्तर प्रदेश के हैं। इन लापता लोगों का सत्यापन अभी तक नहीं हो सका। वहीं पचास के करीब मामले दिल्ली के हैं।

उत्तराखंड सरकार की ओर से संबंधित राज्यों से कई बार पत्राचार हुआ है। बावजूद एक साल बाद भी तमाम परिवार मुआवजे और मृत्यु प्रमाणपत्र न पाने की वजह से भटक रहे हैं।

मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने बताया कि आपदा में मरने वालों सर्वाधिक 1150 उत्तर प्रदेश के थे। बीते साल दिसम्बर में 395 लोगों को छोड़कर शेष का मुआवजा और प्रमाणपत्र भिजवा दिया गया था।

उसके बाद भी जो मामले उनकी ओर से क्लीयर होते जा रहे हैं उन्हें प्रमाणपत्र और मुआवजा भेजा जा रहा है। मध्य प्रदेश के 511 लोग आपदा में लापता हैं इनमें से 26 मामले लंबित हैं।
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इन्हें भी नहीं मिला है मुआवजा

राजस्थान के 511 मामले थे जिसमें 19 रह गए हैं। दिल्ली के जुड़े लोगों की संख्या 216 है। जनवरी में 73 लोगों के प्रमाणपत्र और मुआवजा रोककर बाकी का भेज दिया गया था।

हाल के महीनों में कुछ लोगों के सत्यापन का काम होने के बावजूद अभी यह संख्या 50 के करीब है। महाराष्ट्र के कुल 163 लोग आपदा में लापता हुए थे सभी को मुआवजा व प्रमाणपत्र जारी हो चुका है।

गुजरात के 129 लोगों में जनवरी तक चार शेष थे अब सिर्फ दो लोगों का मामला शेष है। आंध्र प्रदेश केकुल 86 में अभी 20 मामले उलझे हुए हैं जिनका मुआवजा व प्रमाणपत्र जारी होना है।

हरियाणा के कुल 112 लोग प्रभावित थे अभी छह का मुआवजा शेष है। इसी प्रकार बिहार के 58 में 20, झारखंड के कुल 40 में दो, पश्चिम बंगाल के कुल 36 में पांच, उड़ीसा के26 में छह, तमिलनाडू और कर्नाटक के कुल 14-14 लापता लोगों में एक-एक शेष है।

मेघालय के कुल छह  में चार, चंडीगढ़ केचार में 2 और केरल के दो में से दो मामले अभी शेष हैं। जम्मू-कश्मीर, पुदुचेरी व असम केसभी जो भी मामले थे सबका निस्तारण हो चुका है।
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