बड़ी उम्मीद के साथ दिल्ली से देहरादून लौटा था। समझा तो यही था कि गालिब का शहर है लेकिन इश्क की इंतहा देखी तो शायरी भूल गया।
दिल्ली में अमन चैन के साथ नौकरी कर रहे हाकिम को बुलाने के लिए हुक्मरानों ने लाख दुहाई दी। उसे उसके गृह प्रदेश की याद दिलाई, अंतत: वह आया और आने के बाद अब विवश है। सिस्टम में खुद को फिट करने की कोशिश भी बेकार गई। हुकूमत ने ओहदा तो बड़ा दिया, अपर मुख्य सचिव स्तर के बराबर काम दिया, प्रदेश को जगमगाने का जिम्मा भी दिया लेकिन साथ ही हाथ भी बांध दिए। अब चचा गालिब का असली शहर दिल्ली याद आ रहा है।
यहां तो गजब हाल है
बड़े ओहदेदार इस हाकिम ने अपनी पीड़ा कही। भई यहां तो गजब हाल है, कुछ खुर्राट और घाघ किस्म के सूबेदार तो ऐसे हैं जो कि मुख्य सचिव ही नहीं, मुख्यमंत्री की बैठक को भी हाईजैक कर लेते हैं। तबादलों के लिए मंत्री जी की अलग दबाव है। अब मरता क्या ना करता, कलम और शेष नौकरी को सुरक्षित रखने केलिए एक रास्ता निकाला।
ट्रांसफर पोस्टिंग की पावर अपने अधीनस्थ को डेलीगेट कर डाली। बड़े फैसले करने केलिए भी अपने जूनियर को ही को अधिकृत कर डाला। अब कुछ संतोष है, सिफारिशें नहीं आ रही है, दबाव भी बहुत नहीं है लेकिन डर बना हुआ है।