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अब संस्कृत नहीं इस भाषा में शपथ लेंगे मंत्री, जानिए क्यों हुआ व्यवस्था में बदलाव

Fri, 17 Mar 2017 10:46 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : amar ujala
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भाजपा सरकार के कुछ मंत्रियों की संस्कृत भाषा में शपथ लेने की मुराद पूरी नहीं हो पाएगी। संस्कृत में शपथ लेने की राह में उत्तराखंड राजभाषा अधिनियम का पेंच फंस गया है। अधिनियम में संस्कृत को दूसरी राजभाषा का दर्जा तो प्राप्त है, लेकिन उसमें किये जाने वाले शासकीय कार्यों के लिए अधिसूचना जारी करना आवश्यक है। उधर, संस्कृत में शपथ दिलाने की पैरोकारी कर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसांगिक संगठन संस्कृत भारती ने शासन के रुख पर कड़ा एतराज जताया है। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष बुद्धदेव शर्मा ने इस मामले में कोर्ट जाने की चेतावनी दी है।
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बता दें कि शनिवार को भाजपा की ओर से मंत्रियों को संस्कृत भाषा में शपथ दिलाए जाने के संकेत दिए गए थे। संस्कृत भारती की ओर से इस संबंध में शासन से संपर्क किया गया। गोपन विभाग ने सत्तारुढ़ दल की मंशा के हिसाब से हिंदी के साथ संस्कृत भाषा में भी शपथ पत्र तैयार कर लिया था। मगर शासन स्तर पर जब संस्कृत भाषा में शपथ दिलाये जाने के संवैधानिक प्रावधान को खंगाला गया तो पेंच आ फंसा। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, संस्कृत में शपथ दिलाए जाने की राह में उत्तराखंड राजभाषा अधिनियम आड़े आ रहा है। 

राज्य सरकार वर्ष 2009 में यह अधिनियम लाई थी। इसके अनुसार राज्य में शासकीय कार्यों के लिए हिंदी के साथ संस्कृत को दूसरी भाषा का दर्जा दिया गया। मगर दूसरी भाषा के संबंध में यह प्रावधान भी किया गया कि यदि संस्कृत में कोई शासकीय कार्य किया जाएगा तो उसके लिए अलग से अधिसूचना जारी करनी होगी। सरकार के स्तर पर अब तक दो अधिसूचनाएं जारी हुई हैं। पहली हरिद्वार और ऋषिकेश को संस्कृत नगरी के रूप में विकसित करने के लिए और दूसरी अधिसूचना राज्य सरकार के कार्यालयों में नाम पट्टिकाएं हिंदी के संस्कृत भाषा में लिखे जाने के संबंध की गई। 
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संस्कृत भारती ने उठाए सवाल
संस्कृत भारती के प्रदेश अध्यक्ष बुद्धदेव शर्मा शासन के तर्क से सहमत नहीं है। उन्होंने बताया कि वह शुक्रवार को सचिव गोपन अरविंद सिंह ह्यांकी से मिले। मगर उन्होंने राजभाषा अधिनियम का हवाला देकर इंकार कर दिया। शर्मा के मुताबिक, असम के मुख्यमंत्री ने संस्कृत में शपथ ली, जबकि वहां संस्कृत दूसरी राजभाषा भी नहीं है। सुश्री उमा भारती ने मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री पद की शपथ संस्कृत में ली थी। यूपी में जब विष्णुकांत शास्त्री राज्यपाल बनें तब भी उन्होंने संस्कृत में शपथ ली। वहां तो कोई कानून आड़े नहीं आया। उन्होंने कहा कि शासन का रवैया असहयोगात्मक है और इसके विरोध में वह कोर्ट जाएंगे।
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