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नर्सों पर उत्तराखंड सरकार की नरमी पड़ रही भारी

Sun, 13 Sep 2015 12:10 PM IST
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
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नर्सों की हड़ताल पर हाईकोर्ट के सख्त रुख के बावजूद उत्तराखंड सरकार का पूरे प्रकरण में नरमी भरा नजरिया अब भारी पड़ रहा है।
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हड़ताल समाप्त करने के लिए हाईकोर्ट से मिले आदेश के बाद सख्ती के बजाए सरकार ने फिर राज्य पर आर्थिक बोझ डाल उनकी अधिकांश मांगे मान ली है। इतना ही नहीं सरकार ने उन पर एस्मा और नो वर्क नो पे के तहत होने वाली कार्रवाई का अभयदान दे दिया। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद सरकार के झुकने से नर्सों का ऐसा मनोबल बढ़ा कि अब नर्सें हड़ताल तोड़ने को तैयार नहीं हैं।

नर्सिंग संवर्ग के सामूहिक अवकाश फिर हड़ताल से अस्पतालों में मरीज बिलखते रहे, लेकिन सरकार का उनके प्रति रुख नरम ही रहा। सरकारी विभागों में तैनात सवा दो लाख कर्मचारियों के प्रति नरमी की वजह भले राजनीतिक हैं, लेकिन इससे सीधे तौर पर कर्मचारी संगठनों को आंदोलन कर मनमानी मांगे पूरी करने का रास्ता मिल जाता है।
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नर्सिंग संवर्ग के बाद विभिन्न कर्मचारी संगठन के राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद अपनी मांगों को लेकर सिर उठा रहा है। सितंबर 21 और 22 को उनकी मांगों को लेकर कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य की अध्यक्षता में बनी समिति के साथ बैठक होनी है।

हाईकोर्ट में जनहित याचिका पर सरकार को दिए आदेशों के बाद बीच का रास्ता अपनाया गया, जबकि सरकार के पास सख्ती दिखा अन्य विभागीय कर्मचारियों को सचेत करने का मौका मिला।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ बल्कि कई बार हो चुका है कि विभिन्न संगठनों की हड़ताल शुरू होने पर शासन एसमा और नो वर्क नो पे लागू करता है, लेकिन हड़ताल की समाप्ति कर्मचारियों की मांगों से पूरी कर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती।

अकेले स्वास्थ्य विभाग में एएनएम की 2012 में चली चार माह की हड़ताल, फार्मासिस्टों की 2013 में हुई हड़ताल शामिल हैं। नर्सिंग संवर्ग की हड़ताल पर हाईकोर्ट के आदेश होने के बावजूद सरकार की मध्य मार्ग की नीति अब भारी पड़ेगी। नर्सें अधिकांश शर्तों को मनवाने के बाद हाईकोर्ट के आदेशों की परवाह नहीं कर रही ऐसे में अब गेंद सरकार के पाले में है।

नर्सों की हड़ताल ने ली युवक की जान
नर्सों की हड़ताल एक मरीज की जान पर भारी पड़ गई। समय पर दवा और इलाज न मिलने से मरीज की मौत हो गई। परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए हंगामा किया। चिकित्सा अधिकारियों ने लापरवाही से इनकार करते हुए किसी तरह परिजनों को शांत कराया।

मंसूरपुर (मुजफ्फरनगर) निवासी 36 वर्षीय सुशील देहरादून में एक हॉस्टल में नौकरी करता था। 10 सितंबर की रात तबियत खराब होने पर सुशील खुद ही दून अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचा। मरीज को इंजेक्शन और जरूरी दवाएं देने के बाद कुछ देर डॉक्टरों ने अपनी देखरेख में रखा। तबियत में ज्यादा सुधार न होने पर डॉक्टरों को मरीज की हालत गंभीर नजर आई।

इसे देखते हुए डॉक्टरों ने सुशील को इमरजेंसी में ही भर्ती कर दिया। रात को इंटर्न नर्स मरीजों की देखभाल में ड्यूटी पर थी। 11 सितंबर को मरीज की मौत हो गई। दून अस्पताल चौकी पुलिस द्वारा परिजनों को सूचना दी गई। शनिवार को सुशील के परिजन मुजफ्फरनगर से दून अस्पताल पहुंचे।

परिजनों को यहां आकर मालूम हुआ कि अस्पताल में नर्सों की हड़ताल चल रही है। नर्सों की हड़ताल के चलते इलाज और देखरेख में लापरवाही का आरोप लगाते हुए परिजन आक्रोशित हो गए।

परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ हंगामा शुरू कर दिया। हंगामा बढ़ता देख अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी और पुलिस भी इमरजेंसी कक्ष के बाहर पहुंचे। अधिकारियों के कहने पर परिजन शांत तो हो गए, लेकिन वे इस बात पर कायम थे कि सुशील की मौत में अस्पताल से लापरवाही हुई है।
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अस्पताल में भर्ती करने से पहले मरीज या तीमारदारों को नर्सों की हड़ताल के बारे में बताया जा रहा है। फिर भी अगर कोई मरीज भर्ती होता है तो इंटर्न नर्सों और फार्मासिस्टों की मदद से पूरी देखरेख की कोशिश की जा रही है।
- डॉ. आरएस असवाल, प्रमुख अधीक्षक, दून अस्पताल
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