इन सहायक नदियों में भी किया गया सर्वे
- बिजनौर से गंगा सागर तक सर्वे के दौरान सहायक नदियों गागरा, शारदा, राप्ती, गंडक, महानंदा, कोसी, रूपनारायण, बक्शी, ब्रह्मपुत्रा, चंबा, सुंदरवन आदि।
हर डॉल्फिन की अलग पहचान बताता है साउंड सिग्नेचर
विकसित की गई डबल ऑब्जर्वर आधारित मार्क-रिकैप्चर तकनीक में नाव में अलग-अलग जगहों से डॉल्फिन की निगरानी की जाती है। इसके साथ ही हाइड्रोफोन, जीपीएस, अंडर वाटर रिकार्डर आदि के जरिए डॉल्फिन का एंगल और उसका साउंड सिग्नेचर रिकार्ड किया जाता है। 70 किलो हर्ट्ज पर रिकार्ड होने वाली ध्वनि तरंगों में दूरी और एंगल के आकलन कर प्रत्येक डॉल्फिन की अलग पहचान निर्धारित की जाती है। कोई डॉल्फिन पानी में चलती हुई नाव से आगे न निकल जाए, इसके लिए नाव की गति आठ से दस किलोमीटर प्रति घंटा होती है।
इसलिए बेहद धीमी है डॉल्फिन की विकास दर
डॉल्फिन की विकास दर काफी धीमी है। इनका हर 2-3 साल में एक बच्चा पैदा होता है। जो उनकी बढ़ोतरी के जोखिम को बढ़ा रहा है। दिसंबर 1996 में किए गए एक सर्वे के मुताबिक हरिद्वार के भीमगोड़ा बैराज और बिजनौर के बीच गंगा नदी के 100 किलोमीटर के खंड में कोई भी डॉल्फिन दर्ज नहीं की गई, जबकि गंगा के उत्तरप्रदेश भाग में डॉल्फिन की कुल अनुमानित जनसंख्या मात्र 500 दर्ज की गई।