प्रदेश में सरकार बनाने जा रही भाजपा विधानसभा में आंग्ल-भारतीय (एंग्लो इंडियन) समुदाय के प्रतिनिधि का मनोनयन करेगी? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है क्योंकि चुनाव में उसे प्रचंड बहुमत मिला है। संविधान में एंग्लो इंडियन समुदाय को प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से मनोनयन की व्यवस्था है। लेकिन, संविधान में यह प्रावधान वर्ष 2020 तक ही है। बता दें कि प्रदेश में इस व्यवस्था का इस्तेमाल सत्ता का संतुलन साधने के उद्देश्य से ही ज्यादा हुआ है।
पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी की सरकार के समय से आंग्ल भारतीय को प्रतिनिधित्व देने की परंपरा चली आ रही है। वर्ष 2002 में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत तो मिला था। मगर उसका संख्या बल 36 के जादुई आंकडे पर सिमट गया था। विधानसभा में संख्या बल को बढ़ाने के लिए तत्कालीन सरकार ने आंग्ल भारतीय समुदाय के प्रतिनिधि के मनोनयन किया। दरअसल, संविधान में आंग्ल भारतीय समुदाय के प्रतिनिधि को भी निर्वाचित सदस्यों की तरह सदन में वोट देने का अधिकार दिया गया है।
वर्ष 2007 में भाजपा सत्तारुढ़ हुई तो वह बहुमत के आंकड़े से दो अंक दूर थी। 34 की संख्या को जादुई आंकड़े में बदलने के लिए यूकेडी व निर्दलीय सदस्यों का साथ लेने के अलावा आंग्ल भारतीय समुदाय के प्रतिनिधि का मनोनयन किया गया। वर्ष 2012 में कांग्रेस 32 सीटों पर अटकी तो उसने एक बार फिर आंग्ल भारतीय समुदाय के प्रतिनिधि को मनोनीत किया।
मगर इस बार विधानसभा चुनाव में आए नतीजे पिछले सभी चुनावों से एकदम भिन्न है। भाजपा 57 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। बहुमत के मामले में वह सर्वाधिक सहज स्थितियों में हैं। इन हालातों में यह प्रश्न मौजू है कि वह आंग्ल भारतीय समुदाय के प्रतिनिधि का मनोनयन करेगी?