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प्रदेश में जल, जंगल और जमीन की नहीं कोई नीति

Mon, 29 Jul 2013 10:33 AM IST
आफताब अजमत
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सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे कर रही है लेकिन सुरक्षित पुनर्वास के लिए आज तक कोई नीति तैयार नहीं हो पाई है। जल नीति फाइलों में धूल फांक रही है, जंगलों के लिए केंद्रीय कानून लागू है और जमीनों के लिए वर्ष 1950 का एक एक्ट ही आज तक इंप्लीमेंट किया जा रहा है।
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इस लापरवाही की वजह से आपदा का दंश झेलना पड़ रहा है तो दूसरी ओर पुनर्वास में ठोस योजना नहीं बनाई जा सकती। डेवलपमेंट सेंटर फॉर आल्टरनेटिव पॉलिसीज की निदेशक एमएस वानी ने बताया कि जल, जंगल और जमीन की नीति नहीं होने की वजह से प्रदेश में यह हालात बने हैं।

कागजों में जल नीति
प्रदेश बनने के बाद सरकार ने हाईडिल नीति तो बना ली लेकिन जल नीति कागजों में धूल फांक रही है। वर्ष 2003 में जल नीति ड्राफ्ट हुई लेकिन यह केंद्रीय जल नीति की हूबहू कॉपी थी, जबकि उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में यह अलग होनी चाहिए थी। विरोध हुआ, कई बार ड्राफ्टिंग हुई लेकिन आज तक जल नीति लागू नहीं हो पाई। जल नीति के नाम पर कुमाऊं एंड गढ़वाल वाटर एक्ट 1975 ही अमल में लाया जा रहा है। इसमें ऐसे कोई उपाय नहीं है जिससे नदियों से होने वाली तबाही को रोका जा सके।
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फॉरेस्ट पर कोई पॉलिसी नहीं
प्रदेश में केंद्र सरकार की फॉरेस्ट पॉलिसी वर्ष 1988 लागू है। इस पॉलिसी को प्रदेश के परिपेक्ष्य में देखें तो कोई खास लाभ नहीं है। फॉरेस्ट पॉलिसी की वजह से न तो जंगलों का सही संरक्षण हो पा रहा है और न ही जंगली भूमि के सही उपयोग को आंका जा पा रहा है। हाल ही में हिमाचल ने अपनी फॉरेस्ट पॉलिसी लागू की है, ऐसा ही उत्तराखंड में होना चाहिए।

जमीन को कोई नीति नहीं
प्रदेश में जमीनों की खरीद-फरोख्त और लैंड यूज को लेकर आज तक ‘कुमाऊं एंड उत्तराखंड जमींदारी एक्ट 1950’ को अमल में लाया जा रहा है। प्रदेश में आपदाओं के चलते तेजी से बंजर भूमि बढ़ रही है। कृषि भूमि के प्रबंधन और इसे इंप्रूव करने के लिहाज से प्रदेश में कोई पॉलिसी नहीं बनी है। आपदा में पुनर्वास तो किया जा रहा है लेकिन नीति के अभाव में जमीन के सही इस्तेमाल को लेकर कोई कार्ययोजना नहीं है।
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