भले ही, यहां काफी बर्फ मौजूद है। उन्होंने चोरारबाड़ी और ग्लेशियर क्षेत्र के निरीक्षण से संबंधित रिपोर्ट जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी हरीश चंद्र शर्मा के माध्यम से डीएम को सौंप दी है।
इधर, जिलाधिकारी मंगेश घिल्डियाल ने बताया कि दो सदस्यीय टीम द्वारा चोराबाड़ी ताल में किसी प्रकार की झील से इंकार किया गया है। टीम ने चोराबाड़ी और उससे ऊपर तीन किमी क्षेत्र का निरीक्षण किया है, जहां ग्लेशियर में एक झील पाई गई, जो बहुत छोटी है।
इस संबंध में वाडिया हिमालय संस्थान के विशेषज्ञों को भी अवगत करा दिया गया है। इधर, वाडिया संस्थान के वरिष्ठ भू-वैज्ञानिक डॉ. डीपी डोभाल ने बताया कि जून 2013 की आपदा के बाद चोराबाड़ी ताल की जो हालत है, उससे वहां आने वाले 50 वर्षों में भी कोई झील नहीं बन सकती है।
जिस झील की बात की जा रही है, वह चोराबाड़ी से ढाई किमी ऊपर ग्लेशियर जोन में है, जो अस्थायी है। इस प्रकार की झीलें हिमालय क्षेत्र में बनती और टूटती रहती हैं, जो सामान्य प्रक्रिया है। डा. डोभाल ने बताया कि संस्थान की टीम भी चोराबाड़ी ताल के निरीक्षण के लिए अगले दो दिनों में केदारनाथ पहुंचेगी।
केदारनाथ धाम से ऊपर स्थित चौराबाड़ी झील में जलभराव और झील टूटने की आशंका के मद्देनजर सरकार ने नए सिरे से अध्ययन कराने का निर्णय लिया है। इस संबंध में रविवार को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा है कि वैज्ञानिकों से चौराबाड़ी झील का अध्ययन कराया जाएगा और रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निदेशक डॉ. पीयूष रौतेला ने बताया कि जिला आपदा राहत बल रुद्रप्रयाग की टीम की रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौंप दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक चौराबाड़ी झील में न तो जलभराव की स्थिति है और न ही उसके टूटने का किसी प्रकार का खतरा है।
झील को लेकर किसी भी प्रकार का संकट नहीं है। चूंकि मामला चौराबाड़ी झील से जुड़ा है ऐसे में मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अध्ययन कराना जरूरी है। इसके लिए दो दिन बाद वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलाजी के वैज्ञानिकों की टीम चौराबाड़ी भेजी जाएगी जो तमाम पहलुओं का अध्ययन करेगी।